लेख – डॉ. निरंजन कुमार यादव / तुलसी का रामराज्य: एक विश्लेषण

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फोटो - मुकुट शेखर

किसान परिवार में जन्में डॉ. निरंजन कुमार यादव उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले अपने गाँव के पहले युवा हैं। कुशीनगर जनपद के ग्रामीण परिवेश में पले-बढ़े हैं। गोरखपुर विश्वविद्यालय, गोरखपुर से स्नातकोत्तर और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी से पी एच डी की उपाधि प्राप्त की है। इनके शोध का विषय था ‘‘ कबीर साहित्य के अध्ययन और मुल्यांकन की परंपरा का अनुशीलन।’’ वर्तमान में राजकीय महिला स्नातकोत्तर महाविद्यालय में अस्सिटेंट प्रोफेसर के पद पर तैनात हैं। साखी, कथाक्रम, अनिश , संभाष्य, अनुकृति आदि पत्रिकाओं में इनके लेख प्रकाशित हुये हैं। इसके अलावे लगभग आधा दर्जन पुस्तकों के लिए अध्याय लेखन और ‘‘सबके अपने अमित’’ नामक पुस्तक का संपादन किया है। यहाँ प्रस्तुत है डॉ. निरंजन कुमार यादव लिखित लेख – तुलसी का रामराज्य: एक विश्लेषण। . . . संपादक

                              तुलसी का रामराज्य: एक विश्लेषण
                                  डॉ. निरंजन कुमार यादव
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का मत है कि ‘‘यदि कोई पूंछे कि जनता के हृदय पर सबसे अधिक विस्तृत अधिकार रखने वाला हिन्दी का सबसे बड़ा कवि कौन है तो उसका एक मात्र यही उत्तर ठीक हो सकता है कि भारत हृदय, भारती कंठ, भक्त चूड़ामणि गोस्वामी तुलसीदास।’’ निःसंदेह तुलसीदास हिन्दी के बड़े कवि हैं। उनका सृजन, उनकी भाषा, उनका लोकमंगल, उनकी कविता सब कुछ हिन्दी साहित्य में अद्वितीय है।
भक्तिकाल हिन्दी साहित्य का स्वर्ण युग है। यह स्वर्णयुग सिर्फ इसलिए नहीं है कि इस युग में प्रचुर मात्रा में प्रबंध एवं मुक्तक रचनाओं का सृजन हुआ। बल्कि इस युग की रचनाएं अपने समाज को ठीक रुप से समझती और समझाती हैं। सभी रचनाएं मनुष्य और समाज के सन्निकट हैं। ‘भक्तिकाल’ का महत्व सिर्फ भक्तिपरक रचनाओं से नहीं है बल्कि उसमें निहित मानवीय मूल्यों से है। सभी कवियों ने समाज के यथार्थ यानी वर्तमान स्थिति का वर्णन तो किया ही किया उसके बरक्स एक आदर्श (यूटोपिया) समाज व्यवस्था की परिकल्पना भी प्रस्तुत की है। रैदास, कबीर, सूर के अलावा भक्ति शिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास भी ‘राम’ की कथा लिखते समय अपने युग की विषमताओं को नहीं भूलते। उन्होंने समाज की वर्तमान स्थिति को ‘कलिकाल’ (कलियुग) के रुप में वर्णन किया है । तथा इसके बरक्स जिस आदर्श समाज (यूटोपिया) की परिकल्पना करते हैं वही ‘‘रामराज्य’’ है। इसे वह सुराज की भी संज्ञा देते हैं –
जाई सुराज सुदेस सुखारी । होहिं भरत गति तेहि अनुहारी ।।
राम बास बन संपत्ति भ्राजा। सुखी प्रजा जनु पाई सुराजा।।
यह हमेशा याद रखने वाली बात है कि तुलसीदास का सुराज ‘जनतंत्र’ नहीं है, वह ‘रामराज्य’ है। यह प्रजातंत्र की कल्पना नहीं है किन्तु सामन्तवादी व्यवस्था के यथासम्भव दोषरहित रुप की परिकल्पना है। जिसमें साधारण जनता के सुख-दुःख और उसके सम्मान का पूरा ध्यान रखा गया है। ‘रामराज्य’ तुलसीदास के भाववादी, आस्थावादी मस्तिष्क की परिकल्पना है। यह एक ऐसी परिकल्पना है जो उनके समसामयिक (वर्तमान) समाज के दुःख-द्वन्द्व, विषमताओं एवं त्रिविध तापों से मुक्त है। सभी लोकों में हर्षोल्लास का माहौल है –
रामराज बैठे त्रैलोका। हरषित भए गए सब सोका।।
बयरु न कर काहू सन कोई। रामप्रताप विषमता खोई।।
‘रामराज्य’ में सभी लोग परस्पर प्रेम से जीवन निर्वाह करते हैं तथा कोई किसी के प्रति शत्रुभाव नहीं रखता। राम के प्रताप से सभी प्रकार की विषमताएं समाप्त हो गई थी। कलिकाल में बार-बार अकाल पड़ता था। अन्न के अभाव में लोग मर रहे थे।
लोग धर्म, कर्म, यज्ञ आदि कर्म तामस भाव से कर रहे थे, दैव जल नहीं बरसाते थे। फलस्वरूप बीज बोने से फसल नहीं उगती थी। लोग धन-हीन एवं दुःखी थे। लोग पीड़ित थे। उनकी आयु क्षीण हो गई थी। अल्पायु में ही लोग काल कवलित हो रहे थे। कुल मिलाकर कलिकाल ने लोगों को बेहाल कर रखा था। अच्छी और बुरी सभी जातियों के लोग अकाल के चलते अपनी-अपनी जाति छोड़कर भिखारी बन गये थे –
बाले बारहि बार दुकाल परै। बिनु अन्न दुखी सब लोग मरै।।
नर पीड़ित रोग न भोग कहीं। अभिमान विरोध अकास हो।।
लघु जीवन संवत पंचदसा। कलपांत न नास गुमानु असा।।
नहीं दोषी विचार न सीतलता। सब जाति कजाति भए मगता।।
कुल मिलाकर जहाँ दरिद्रता, रोग, कुसंग, खल इत्यादि दोष कलियुग के हैं। वहीं यह सब रामराज्य में नहीं है। रामराज्य में कोई भूखा नहीं है। सभी के पास भरपूर अन्न है। फसलों को नष्ट करने वाले अतिवृष्टि, अनावृष्टि, चूहों-टिड्डियों और राजाओं के आक्रमण का उत्पात बिल्कुल समाप्त हो गया है। फसलें भरपूर होती हैं। लताएं और वृक्ष मांगने से ही मधु (मकरन्द) टपका देते हैं। गौएं मनचाहा दूध देती है। धरती फसलों से लहलहाती रहती है। अब कोई अल्प अवस्था में मृत्यु की गति को प्राप्त नहीं करता है। न किसी को किसी प्रकार का भय है। नहीं कोई पीड़ा है। सभी के शरीर सुन्दर और निरोगी हैं। न कोई अब दरिद्र है, न दुखी है और न ही दीन है। सभी शुभ लक्षणों वाले लोग हैं –
लता विरप मागें मधु चवही। मन भावतो धेनु पय स्त्र वहीं।
ससि सम्पन्न सदा रह धरनी। त्रेता भइ कृतजुग कै करनी।।
अल्प मृत्यु नहि कवनिद पीरा। सब सुन्दर सब बिरूज सरीरा।
नहि दरिद्र कोउ दुखी न दीना। नहि कोउ अबुध न लच्छन हीना।।
रामराज्य में ‘दण्ड’ केवल सन्यासियों के ही हाथों में है। यानी आज के भाषा में कहें हो रामराज्य में पूर्णतः निशस्त्रीकरण हो चुका था। ‘दण्ड’ ‘भेद’ और ‘जीतो’ मानवीय द्वेष और पराक्रम के अर्थ को बिल्कुल त्याग चुके हैं। जिस प्रकार दण्ड केवल सन्यासियों के हाथों में है उसी प्रकार ‘भेद’ सिर्फ नाचने वाले समाजों में है। यह भेद सुर ताल का है। और ‘गीतो’ शब्द केवल मन को जीतने के लिए रूढ़ हो गया है। चोर-डाकूओं आदि का दमन करने के लिए साम, दाम, दण्ड और भेद ये चार उपाय किये जाते हैं। रामराज्य में कोई शत्रु है ही नहीं, इसलिए ‘जीतो’ शब्द केवल मन के जीतने के लिए ही कहा जाता है। क्योंकि रामराज्य में कोई अपराध करता ही नहीं, सभी अपनी स्थिति से संतुष्ट हैं। जब असंतोष होता है तभी समाज में अपराध होता है। अतः रामराज्य में किसी को दण्ड नहीं होता है। ‘दण्ड’ शब्द केवल इस राज्य में सन्यासियों के हाथों में रहने वाले दण्ड के लिए ही रह गया है तथा अनुकूल होने के कारण भेदनीति की आवश्यकता ही नहीं रह गयी। ‘भेद’ शब्द केवल सुर, ताल के भेद के कामों लिए ही आता है –
दण्ड जति-हकर भेद जह नर्तक सामाज।
जीतहु मनहि सुनिअ जस रामचन्द्र के राज।।
सभी प्रकार से जनता सम्पन्न है। धरती से भरपूर अन्न हो रहा है। वनों में वृक्ष सदा फलते फूलते रहते हैं। कहने का आशय यह है कि कहीं भी किसी प्रकार की विपन्नता नहीं है। मनुष्यों में परस्पर प्रेम तो है ही। पशु-पक्षियों में भी परस्पर प्रेम है। हाथी और सिंह परस्पर बैर भुलाकर प्रेमपूर्वक एक दूसरे के साथ रह रहे हैं। पक्षी और पशु सभी ने स्वाभाविक बैर भुलाकर सानंद प्रेमपूर्वक साथ रहना स्वीकार कर लिया है। पक्षियां निद्वंद होकर कूजती हैं। भांति-भांति के पशुओं के समूह वन में निर्भय विचरते और आनंद करते हैं। समुद्र अपनी मर्यादा में रहते हैं। बाढ़ और सुनामी जैसी कोई घटना नहीं होती उल्टे समुद्र अपने रत्नों को किनारे पर लाकर डाल देता है जिन्हें मनुष्य पाकर आनंदित होते रहते हैं। सब तालाब कमलों से परिपूर्ण हैं। दसों दिशाओं के विभाग (अर्थात सभी प्रदेश) इस रामराज्य से अत्यन्त प्रसन्न हैं –
फूलहिं फरहिं सदा तरु कानन। रहहिं एक संग गज पंचानन।।
खग मृग सहज बयरु बिसराई। सबहि परस्पर प्रीति बढ़ाई।।
कूजहिं खग मृग नाना वृदा। अभय परहिं बन करहिं अनंदा।
सीतल सुरभि पवन वह मंदा। गुंजत अलि लै चलि मकरंदा।
सागर निज मरजादा रहही। द्वारहि रत्न तटन्हि नर लहही।।
सरसजि संकुल सकल तड़ागा। अति प्रसन्न दस दिसा विभागा।।
निश्च्य ही यहाॅ तक तो तुलसी का रामराज्य एक सुखद स्वप्नलोक है। जिसे तुलसीदास अपने समय के समाज को दिखाते हैं। जहाॅ किसी प्रकार का कोई दुख नहीं है। विषमता नहीं है। लोग प्रेमपूर्वक आनंद के साथ रहते हैं। यह पूर्णतः सुखद है। यह हमारे सामने ‘सुराज’ का सर्वोत्तम नमूना है। यही गांधी के नजर में भी स्वराज्य का आदर्श नमूना है। महात्मा गांधी इसी रामराज्य के हिमायती थे। उनका सपना था कि भारत जब आजाद हो तो यहाॅ भारतीय परम्परा के अनुकूल रामराज्य की स्थापना हो। भारत के लिए रामराज्य से बेहतर प्रजातंत्र का कोई दूसरा विकल्प नहीं हो सकता है। यह गांधी जी की ‘रामराज्य’ के प्रति अटूट आस्था का परिचायक है। रामराज्य के प्रति अपार श्रद्धा थी। गांधी के बाद भी स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात ‘रामराज्य’ की अनुगूंज भारतीय जनमानस तथा लोकतंत्र में बनी हुई है। बहुत सी पार्टियों के मुख्य एजेण्डे में ‘रामराज्य’ की अवधारणा विद्यमान है। इसी परिकल्पना पर कितनी सरकारें बन गयी और कितनी गिर गई। वर्तमान सरकार के एजेण्डे में भी सुसाशन या रामराज्य शामिल है। ‘सबका साथ सबका विकास’ रामराज्य की अवधारणा है। तुलसीदास और उनके रामराज्य में सब कुछ ठीक-ठीक ही है ऐसा नहीं है ? कलियुग कलियुग क्यों है ? और रामराज्य रामराज्य क्यों है ? जब इसके मूल की पड़ताल करते हैं तो तुलसी और उनका कल्पित ‘सुराज या रामराज्य’ कटघरे में हो जाते हैं। मुक्तिबोध ने एक बहुत मार्के की बात कही है कि ‘तय करो किस ओर हो तुम’ या पार्टनर तुम्हारी पाॅलिटिक्स क्या है? जब तुलसी की पक्षधरता या उनकी पालिटिक्स समझ में आती है तो उनके सभी आदर्शों और सुशासन पर प्रश्न चिन्ह लग जाता है ? सबका साथ सबका विकास की पक्षधरता क्या है ? जब इस बात की पड़ताल की जाती है रामराज्य की तरह इसकी भी पोल खुल जाती है। समाज में हमेशा अमीर-गरीब, शोषक-शोषित, ऊँच-नीच रहे हैं, अब भी हैं तो यह कैसे संभव है कि दोनों के साथ रहा जाय। जबकि दोनों एक दूसरे के धुर विरोधी हैं। अगर हम रहते भी हैं तो हमारी पक्षधरता क्या होगी ? अगर हम निष्पक्ष रहते हैं तो समाज में सुशासन या सुराज नाम की कोई अवधारणा आ ही नहीं सकती। समाज एक खाई के साथ ही आगे बढ़ता रहेगा। यह बिल्कु एक बेमानी अवधारणा है। तब भी और अब भी। यही कारण है कि तुलसीदास ने जिस सर्वोत्तम समाज ‘रामराज्य’ की परिकल्पना की थी आज उपहास का पात्र बन गया है। जहाॅ सामर्थवान की मनमर्जी चलती है, जहाॅ अव्यवस्था अपने चरम पर है तो भी लोग उसे ‘रामराज्य’ के नाम से ही अभिहित करते हैं। जैसे सरकारी दफ्तरों में कर्मचारियों का समय से न आना, प्राथमिक विद्यालयों और बाबुओं को महीने में एकाध बार विद्यालय और दफ्तर आना। फरियादी को कल बुलाकर स्वयं नहीं आना इत्यादि इन सारी घटनाओं को कार्यालय का परिचारक ‘रामराज्य’ के रूप में देखता है। इन सारी घटनाओं से जनता क्षुब्ध होकर जब तिलमिलाती है और व्यवस्था को भला-बुरा कहती है तो फिर परिचारक हल्की मुस्कान के साथ तुलसीदास की पंक्ति ‘समरथ को नहीं दोष गुसाई’ को गुनगुना देता है। यही घटना मुझे तुलसी के रामराज्य को पड़ताल करने के लिए प्रेरित किया। अगर ‘रामराज्य’ वाकई इतना अच्छा होता तो उपर्युक्त घटनाएं हमारे सामने नहीं घटित होती। इस बात पर विद्वान लोगों को आपत्ति हो सकती है। वह लोग ‘‘जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी। सो नृप अवसि नरक अधिकारी’’ को उद्धृत कर सकते हैं। हमारी भी यही धारणा है कि प्रजा की देखरेख तथा समाज को सुव्यवस्थित रूप से संचालन करना ही राजा का धर्म होना चाहिए। किन्तु तुलसीदास की नजरो में वह प्रजा एक खास वर्ग है। निसंदेह तुलसीदास ने अपने समाज की विषमताओं को बेजोड़ ढंग से उजागर और चित्रित किया है। उन्होंने अपने समाज में व्याप्त दरिद्रता, अकाल, रोग और दुख का वर्णन जिस रूप में किया है उसकी कोई शानी नहीं है। लेकिन यह सब क्यों है ? जब हम इसकी पड़ताल करते हैं तो तुलसीदास की पक्षधरता साफ-साफ परिलक्षित होने लगती है। समाज में व्याप्त सभी प्रकार के रोग, दुख, दरिद्रता और अकाल को वे कलिकाल का प्रभाव मानते हैं। लेकिन समाज में ‘कलिकाल’ क्यों आया? वह कौन सी घटना है जिसके चलते तुलसी को लगता है कि अब समाज की सारी व्यवस्था उलट-पुलट रही है और कलिकाल या कलियुग आ गया है। जब हम इस पर विचार करते हैं तो तुलसीदास की सामंती व्यवस्था के पोषक विचारधारा पर से ‘रामराज्य’ के बादल को फटते देर नहीं लगती। तुलसीदास के वर्ण व्यवस्था पोषी एवं सामंती विचारधारा को सुराज या रामराज्य रूपी कुहासे देर तक नहीं ढंक पाते हैं। वह उजागर होता है। वामपंथी विचारधारा भले ही आज शक के दायरे में है। उसकी प्रगतिशीलता भले ही संदेहास्पद है। उनकी पक्षधरता पर भले ही हजारो सवाल खडे़ किये जा सकते हैं या खड़े हो रहे हैं फिर भी रामराज संबंधी उनका मत बहुत साफ व ठीक है। वे रामराज्य उस व्यवस्था को समझते हैं ‘जो राजाओं, सामंतो और कर्मकांडी पुरोहितों के अधीन हो, सामान्य जनता को जहाॅ दबाकर रखा गया हो, स्त्रियों के साथ गुलामों जैसा व्यवहार हो तथा दलितों का उत्पीड़न हो। उसकी स्पष्ट अवधारणा है कि रामराज्य का मतलब होगा देश को पीछे की और लौटाना तथा प्रगति का मार्ग अवरूद्ध करना।’
इसमें कोई दो राय नहीं कि वामपंथी विचारधारा कभी-कभी अतिवाद का शिकार हो जाती है। हमेशा उसका नजरिया सही हो ऐसा भी नहीं है। लेकिन ‘रामराज्य’ के प्रति जो भी उसकी अवधारणा है अगर कलियुग में व्याप्त दोषो, बुराईयों के कारण के आधार पर है तो शत-प्रतिशत सही है। तुलसीदास कलिकाल या कलियुग को वर्तमान समय के रूप में देख रहे हैं। यहाॅ तक तो बात ठीक है लेकिन उसमें व्याप्त दुख, रोग, क्लेश , दरिद्रता, विषमता आदि क्यों है? जब इसका वर्णन करते हैं तभी वह कटघरे में आ जाते हैं।
तुलसीदास के अनुसार समाज में व्याप्त जो बुराईयाॅ हैं जिसे वह ‘कलियुग’ या कलिकाल नाम से अभिहित करते हैं वह ‘वर्णाश्रम व्यवस्था’ के परित्याग के चलते है। यही वह मूल तत्व है जिसके उजागर होत ही तुलसी की पोल खुल जाती हैं। जिसके आधार पर उनहें सामंतवादी, जातिवादी आदि व्यवस्थाओं के पोषक के रूप में भी देखा जाता है। तुलसीदास को बहुत दुःख है कि कलियुग में वर्णाश्रम व्यवस्था टूट रही है। जब सभी ज्ञान के अधिकारी हो रहे हैं। शुद्र भी ब्राम्हणों से तर्क करने लगे हैं। उन्हें उपदेश देने लगे हैं –
शूद्र द्विजन्ह उपदेसहि ग्याना। मोलि जनेऊ लेहि कुदाना।
बदहिं शूद्र द्विजन्हसन हम तुम्ह ते कछु घाटि।
जनइ ब्रह्रा जो विप्रवर आंखि देखावहिं डाॅडि।।
तुलसीदास के ठीक पहले कबीर आदि संतो ने समाज में जिस ज्ञान और तर्क के सहारे ‘‘साबर उपरे मानुष ‘सत्य’ की स्थापना की थी, तुलसी उसी को अव्यवस्था मानते हैं। कबीर ने तो जाति, धर्म, वर्ण, सबको चुनौती दिया था। लोगों में व्याप्त जड़ता को मिटाकर चेतना का संचार किया था। वेद, कतेब को झूठा बताया था। लेकिन तुलसीदास को इससे बहुत दुःख था। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि कबीर का समाज ही तुलसी के लिए कलिकाल है –
वेद-पुरान विहाइ सुपंथु, कुमारग कोटि, कुचालि चली है।
कालु कराल नृपाल, कृपाल न राज समाजु बड़ोई छली है।
वर्न विभाग न आश्रम धर्म दुनी दुख दोष दरिद्र दली है।
वर्णाश्रम व्यवस्था का टूटना तथ वेद विहित धार्मिक पथ का निर्वाह न करना ही ‘कलिकाल’ है जिसके चलते समाज में दरिद्रता, दुर्भिक्ष, दुःख, दुर्वृति और कुशासन दिनों-दिन दूने होते जा रहे हैं और सुख एवं अच्छे दिन घटते जा रहे हैं। तुलसी का दृष्टिकोण बिल्कुल आस्थावादी है। इसमें वैज्ञानिकता की कोई गुंजाइश नहीं है। तर्क करने वाले तो नर्क के अधिकारी हैं – ‘‘कल्प कल्प भरि एक एक नरका। परहिं जे दूषहिं श्रुति करि तरका।
पिछड़ी और नीच समझी जाने वाली जातियाॅ भी कलियुग में सन्यासी (ज्ञानी) हो जाती है। वह भी तर्क करने लगती है। वेद, पुराणों की बातों पर बहस करने लगी है। ब्राम्हणों का सम्मान करना त्याग दिया है बल्कि वे खुद सम्मान पाने के इच्छुक हैं। उन्हें लोक-परलोक का भय समाप्त हो गया है। तुलसीदास की नजर में यह सब कलियुग है। उसी का प्रभाव है –
जे बरनाधम तेलि कुम्हारा । स्वपच किरात कोल कलवारा।
नारि मुई गृह संपति नासी। मूड़ मुड़ाइ होहिं सन्यासी।
ते विप्रन्ह सन आयु पूजावहि । उभय लोक निज हाथ नसावहिं।
सूद्र करहिं जप तप ब्रत नाना। वैठि बरासन कहहिं पुराना।
सब नर कल्पित करहिं अचारा। जाई न बरनि अनीति अपारा।
इससे स्पष्ट हो जाता है कि तुलसी घोर ब्राम्हण वादी एवं वर्णाश्रम व्यवस्था के समर्थ हैं। विश्वनाथ त्रिपाठी ने भी इस बात को सहर्ष स्वीकारा है कि ‘‘अवर्णो के प्रति ऐसी ह्रदयहीन पंक्तियाॅ भी मध्यकाल के किसी कवि ने नहीं लिखी है। यह तुलसी का वर्ण व्यवस्था के प्रति जड़ मोह है और पुनरूत्थानवाद है जो जप-तप व्रत करने और वरासन पर बैठने का अधिकार केवल ब्राम्हणों को देता है। जिस विवेक के महत्व को गुणगान करते हुए तुलसी नहीं थकते वह ऐसे अवसरों पर वर्णाश्रम व्यवस्था की कट्टरता को ढंक जाता है। ऐसी पंक्तियों को लिखने के लिए तुलसी की सफाई देने को नहीं उनकी और अधिक निंदा करने की जरूरत है।’’ तुलसी के यहाॅ शूद्रो की सबसे दयनीय स्थिति है इस बात को सभी विद्वानों को सहर्ष स्वीकार करना चाहिए। बेजा गाल बजाने और कुतर्क करने से कोई फायदा नहीं है। तुलसीदास को इस बात को लेकर जितनी भी आलोचना होगी वह सब जायज और उचित है। कुछ विद्वानों को यह मानना है कि शूद्रो की निंदा तुलसी अपनी ओर से नहीं करते पात्रों से करवाते हैं। वह प्रसंगवश आता है। लेकिन सवाल यह है कि यह प्रसंग सिर्फ खल पात्रों द्वारा शूद्रों के लिए ही क्यों आता है? जबकि रामचरित मानस का खल पात्र ‘रावण’ जप-तप-व्रत करने वाले ऋषियों का नाश करने वाला है तो ऐसे में उसके मुख से इन जप-तप-व्रत करने वाले सन्यासियों के प्रति शूद्रों के प्रति की गयी भाषा जैसा प्रयोग क्यों नहीं करता? भयभीत समुद्र ब्राम्हण राक्षस रावण के लिये क्यों नहीं अधम दुष्ट आदि भाषा का प्रयोग करता? क्यों वह ‘ढोल गवार शूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी’’ ही कहता है? यह एक गहरी साजिश है। यह तुलसी और वर्ण व्यवस्था, जातिवादी पोषक विद्वानों की रणनीति है। ऐसे वाक्य और तर्क सवर्णो की मनोवृत्ति के सूचक है।। इस बात को समझना चाहिए कि ‘‘उस समय हमारे देश में सवर्णो का रुख अवर्णो के प्रति प्रायः संकीर्ण होता था। निर्गुण धारा के तेजस्वी कवि कबीर के प्रभाव से उस समय अवर्णो में से भी कुछ को ऐसा साहस हो चला था कि वे वर्ण व्यवस्था को जन्मना नहीं कर्मणा मानने की बात करने लगे थे। इस बात को शुक्ल जी ने भी स्वीकार किया है कि कबीर ने ‘‘मनुष्यत्व की सामान्य भावना को आगे करके निम्न श्रेणी की जनता में आत्म गौरव का भाव जगाया।’’ निःसंदेह निर्गुण भक्ति ने लोगों को तर्क करने की शक्ति दी। अब वह भी कहने लगे थे कि ब्रहम को हम भी जानते है अतः हम भी ब्राम्हण हुए। तुलसीदास इस प्रवृत्ति को कलियुग मानते हैं। इस प्रवृत्ति को बढ़ावा देने वाले कबीर की भी निंदा करते हैं –
साखी सबदी दोहरा, कह कहनी उपखान।
भगति निरूपहि भगत कलि निंदहि वेद पुरान।।
तुलसीदास के विचार में शूद्रों की सबसे दयनीय अवस्था है। उनका साफ मानना है कि शूद्र समाज में दब कर रहें । सबकी सेवा करें। ब्राह्मणों से तर्क-वितर्क न करें। यह तभी होगा जब समाज में वर्ण व्यवस्था कायम रहेगी। इसीलिए तुलसी का सामाजिक आदर्श वर्ण-व्यवस्था का ही बना है जिसके अनुसार विप्र की पूजा होनी चाहिए शूद्रों की नहीं। यह बात तब और हास्यास्पद हो जाती है जब तुलसीदास इस मान्यता पर आकर अड़ जाते हैं कि अगर ब्राम्हण गुणहीन हो तो भी उसकी पूजा होनी चाहिए जबकि शूद्र सभी गुणों से परिपूर्ण हो तब भी उसकी पूजा नहीं होनी चाहिए।
पूजिय ब्रिप सकल गुण हीना। शूद्र न पूजिय परम प्रवीना।
इस बात से सिद्ध हो जाता है कि शूद्र चाहकर भी अपनी स्थिति नहीं बदल सकते। अगर बदलने की कोशिश करते हैं तो ‘कलियुग’ आ जायेगा जिससे समाज में दैहिक, दैविक और भौतिक ताप व्याप्त हो जायेगें। तुलसी विशुद्ध वर्ण व्यवस्था वादी रामराज्य की बात करते हैं जो एक जड़ व्यवस्था है। साहित्य समाज को जड़वत नहीं बनाता अपितु उसे गति देता है। प्रेमचन्द्र के हवाले से बात कही जाय तो ‘‘हमारी कसौटी पर वही साहित्य खरा उतरेगा, जिसमें उच्च चिंतन हो, स्वाधीनता का भाव हो, सौन्दर्य का सार हो, सृजन की आत्मा हो, जीवन की सच्चाईयों का प्रकाश हो जो हममें गति और बेचैनी पैदा करें, सुलाए नहीं क्योंकि अब और ज्यादा सोना मृत्यु का लक्षण है।’’
इस कसौटी पर कसे तो तुलसी का ‘रामराज्य’ न तो समाज में स्वाधीनता का भाव पैदा करता है और न ही हममें गति और बेचैनी पैदा करता है। इसलिए वर्तमान परिवेश में यह बिल्कुल अप्रांसगिक प्रतीत होता है। तुलसीदास जी के यहाॅ वर्णाश्रम व्यवस्था टूटने से कलियुग आ जाता है और समाज में तरह-तरह के कष्ट और रोग व्याप्त हो जाते हैं किन्तु जैसे ही वर्णाश्रम व्यवस्था कायम होती है तो रामराज्य आ जाता है। रामराज्य में सभी लोग वर्णाश्रम व्यवस्था के अनुसार अपना-अपना धर्म-कर्म करने लगते हैं। सभी वेदमार्गी हो जाते हैं जिससे किसी को किसी प्रकार का कोई कष्ट नहीं है। सभी सुखी हैं। दुःख दरिद्रता गायब हो जाती है –
वरनाश्रम निज निज धरम निरत वेद पथ लोग
चलहिं सदा पावहि सुखहि नहिं भय सोक न रोग।
सब नर करहिं परस्पर प्रीति। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीति।।
यहाॅ तक आते-आते तुलसीदास की सारी चालाकियों और वर्ण व्यवस्था के प्रति मोह का पर्दाफास हो जाता है। एक खास वर्ग जिसका समाज में प्रभुत्व बरकरार है अगर वह बना रहता है तभी रामराज्य है। नहीं तो कलियुग है। तुलसीदास की वर्ण व्यवस्था के प्रति तो अटूट श्रद्धा है ही। वह अपनी इच्छा को ईष्वर की ईच्छा बनाने की भी भरपूर कोशिश करते हैं –
सब मम प्रिय सब मम उपजाए। सब ते अधिक मनुज मोहि भाए
तिन्ह महॅ द्विज द्विज महॅ श्रुतिधारी । तिन्ह महुॅ निगम धरम अनुसारी
तिन्ह महॅ प्रिय विरक्त पुनि ग्यानी। ग्यानिहु ते अति प्रिय विग्यानी
तिन्ह ते पुनि मोहि प्रिय निज दासा। जेहि गति मोरि न दूसरि आसा
पुनि पुनि सत्य कहऊ तोहि पाहीं। मोहि सेवक सम प्रिय कोउ नाहीं।
एक बात मुझे बार-बार खटकती थी कि महात्मा गांधी रामराज्य के हिमायती थे। भारतीय राजनीति में उनका वर्चस्व भी था फिर जब देश आजाद हुआ तो हमारे देश में तुलसी की अवधारणा वाली ‘रामराज्य’ की व्यवस्था न लागू होकर कबीर के मूल्य समानता, स्वतंत्रता और बन्धुत्व वाली व्यवस्था क्यों लागू हो गई। हमारे देश की संविधान की प्रस्तावना जो उसकी आत्मा कही जाती है वह तुलसी बरक्स कबीर के ज्यादा निकट है । इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि तुलसी का रामराज्य धर्म और आस्था पर टिका है जबकि कबीर का समाज तर्क और ज्ञान विज्ञान पर। परस्पर प्रेम, सौहार्द, बंधुत्व, सभ्यता आदि मानवीय गुण है। लेकिन इस धर्म के खाते में खतिया लिया गया है। बंधुत्व और ममता, सभ्यता तथा प्रेम सामाजिक जीवन के आरम्भ से ही आदर्षवादियों का सुनहला स्वप्न रहा है। धर्म प्रवर्तको ने धार्मिक, नैतिक और आध्यात्मिक बंधनों से इस स्वप्न की सच्चाई बनाने का सतत, किन्तु निष्फल प्रयास किया क्योंकि मानवीय मूल्य मनुष्यता के गुण हैं धर्म के नहीं। हाॅ धर्म के अंदर रखकर बस लोगों को गुमराह अवश्य किया गया है। इस परिप्रेक्ष्य में हम धार्मिक सुधार आंदोलनों को देख सकते हैं। जब-जब जनता धर्म के प्रति उदासीन होकर मनुष्यता की तरफ लौटी है तब-तब धर्म प्रवर्तकों द्वारा धार्मिक सुधार की घोषणा हुई। प्रेमचन्द्र ने बहुत ही ठीक कहा कि ‘‘आजमाये को आजमाना मूर्खता है, इस कहावत के अनुसार यदि हम अब भी धर्म और नीति का दामन पकड़कर समानता के ऊँचे लक्ष्य पर पहुॅचना चाहें तो विफलता ही मिलेगी।’’ शायद यह बात स्वतंत्रता प्राप्ति तक हमारे राष्ट्रनायक समझ चुके थे इसीलिए हमारे देश में रामराज्य की जगह लोकतंत्र की स्थापना हुई जो बहुत प्रासंगिक है।
आज भी शाखा के लोग रामराज्य की बात करते नहीं थकते। क्योंकि वे वर्णाश्रम व्यवस्था के हिमायती हैं। वह उसी जड़ समाज में जीना चाहते हैं जहाॅ जन्मना ही श्रेष्ठता की निशानी है। कर्म का बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। मैनेजर पाण्डेय जी ने ठीक ही चिन्हित किया है कि तुलसी अब सिर्फ शाखाओं के कब्जे में है।’’ उन्हीं के लिए हितकारी है। कविता के लिए हमेशा हिन्दी साहित्य में सर्वोच्च शिखर पर तुलसी विद्यमान रहेगें किन्तु समाज व्यवस्था की जब भी बात आयेगी तो उनकी आलोचना अवश्य होगी।
भक्तिकाल के सभी कवि एक यूटोपिया रचते हैं चाहे वह निर्गुण काव्यधारा के हो या सगुण काव्यधारा के। सभी एक आदर्श समाज की परिकल्पना करते हैं, चाहे वह रैदास हो, कबीर हो, सूर हो और तुलसी का तो जग प्रसिद्ध है ही। रैदास का ‘बेगमपुर’ और कबीर का ‘अमरपुर’ तुलसी के ‘रामराज्य’ की तरह ही एक यूटोपिया ही है। जहाॅ ये लोग समाज में व्याप्त धर्म-कर्म के नाम पर फैली रूढ़ियों एवं बुराईयों की आलोचना करते हैं। जड़ समाज को तोड़कर एक गतिशील समाज की परिकल्पना ही रैदास का बेगमपुर है तथा कबीर का अमरपुर है। जहाॅ धर्म और जाति, रुढ़ि और कर्मकाण्ड हीं मानवीय प्रेम और मनुष्यता सर्वोच्च है। कबीर इस काम को ज्यादा ध्वसात्मक रूप में करते हैं जबकि रैदास कहीं भी बिल्कुल रैडिकल नहीं होते। इस मामले में अगर सबसे मजबूत यूटोपिया अगर किसी की है तो वह है सूरदास की। जो सामाजिक धरातल पर समाज के हित में प्रतिफलित होता है। यह कबीर और रैदास की आगे की चीज है जिससे समाज में उतरा हुआ देखते हैं। इनका यूटोपिया जीवन्त फार्म में है। समाज की आधी आबादी कही जाने वाली स्त्रियों की स्थिति कबीर और रैदास यहाॅ तो बिल्कुल नगण्य है। लेकिन सूर के यहाॅ वह भरपूर सौन्दर्य और रस के साथ जीवंत रूप में मौजूद है। तुलसी के यहाॅ भी स्त्रियां हैं लेकिन सूर के यहाॅ स्त्रियाॅ सामंती व्यवस्था और ढांचे की जो बेडियां स्त्रियों के पैरों में पड़ी हैं वह टूटती हैं। रविदास और कबीर के यहाॅ जातिवाद की बेड़ियां टूटती हैं। हिन्दु मुस्लिम विभेद की दीवारे ढहती हैं। कहने का आशय यह है कि इन लोगों के यहाॅ सामंती मूल्य टूटते हैं। जबकि तुलसी के यहाॅ सामंती व्यवस्था के भीतर ही सुधार की गुजांइश बनती है। इनके यहाॅ सामंती ढ़ाचे की भीतर ही जितना आदर्शीकृत समाज हो सकता है यह उतने की ही बात करते हैं। इसीलिए इनका यूटोपिया काफी हद तक कमजोर है । क्योंकि यह सामंती वर्णाश्रम व्यवस्था की प्रशंसा करते हैं। स्त्रियों को निर्धारित कामों में ही लगाये रखते हैं। जबकि बाकी लोगों के यहाॅ ऐसा नहीं है। इसीलिए जब तुलसीदास की यूटोपिया को साहित्य ही मनुष्य का लक्ष्य है कि कसौटी पर कसते हैं तो वह चरमरा जाता है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में वह अप्रासंगिक हो जाता है। इस रूप में हम पाते हैं कि भक्तिकाल के कवियों में अगर सबसे मजबूत यूटोपिया किसी का है तो वह है सूरदास का।
निष्कर्षतः हम कह सकते हैं कि तुलसीदास जिस समाज की परिकल्पना करते हैं वह स्वार्थ, त्याग और बलिदान सिखाने वाला है । इन्होंने जिस राज्य की परिकल्पना की है वह लोकाराधन के लिए राज्य सुख राग आदि सबको निछावर करने वाला हैं । इन्होंने राजा और प्रजा के लिए जो आदर्श रखा है वह प्राचीन वर्ण व्यवस्था का पुनरूज्जीवक है। वहाँ सुधार की तो गुजांइश है किन्तु परिवर्तन की नहीं।
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