किसान परिवार में पली-बढ़ी डॉ. मधुलिका बेन पटेल जवाहर लाल नेहरू विष्वविद्यालय दिल्ली से एम. फिल. और पी.एच.डी. की उपाधि प्राप्त की हैं। माँ और बहन की प्रेरणा से पढ़ाई के साथ-साथ लेखन कार्य में रूची बढ़ी। बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर का जीवन सघर्ष और उनके साहित्य से काफी प्रभावित हैं। पठन-पाठन के अलावे कविता और लेख लिखने में दिलचस्पी है। कई प्रतिष्ठित शोध पत्रिकाओं में इनकी रचनाएँ प्रकाशित हुई है , इसके अलावे कई संपादकों ने अपनी संपादित पुस्तक में इनके लेख को स्थान दिया है। प्रतिबंधित हिन्दी कविताएँ नामक पुस्तक का प्रकाशन हो चुका है। तमिलनाडु केन्द्रीय विष्वविद्यालय, तिरूवारूर के हिन्दी विभाग में सहायक प्राध्यापक के पद पर आसीन मधुलिका फणीश्वरनाथ रेणु डॉट कॉम के संपादकीय निदेशक मंडल से भी जुड़ी हैं। प्रस्तुत है मधुलिका द्वारा लिखित लेख आधुनिक हिन्दी कविता में राष्ट्र की अवधारणा ( प्रतिबंधित हिन्दी कविता के सन्दर्भ में ) ….. संपादक
                       आधुनिक हिन्दी कविता में राष्ट्र की अवधारणा
                        (प्रतिबंधित हिन्दी कविता के विशेष सन्दर्भ में)
                                 डॉ. मधुलिका बेन पटेल
आधुनिक हिन्दी कविता की धारा को सामान्य तौर पर दो भागों में विभक्त कर देखा जा सकता है| पहला– स्वतंत्रता पूर्व और दूसरा- स्वतंत्रता के पश्चात| इन दोनों धाराओं में राष्ट्र की अभिव्यक्ति के अलग – अलग स्वरूप प्राप्त होते हैं | कविता की प्रथम धारा में देश की दुरवस्था, अंग्रेजों के प्रति आकोश और देश की स्वतंत्रता सम्बन्धी भाव प्राप्त होते हैं| इस समय प्रमुख रचनाकारों में भारतेंदु, द्विवेदी, छायावाद, प्रगतिवाद और प्रयोगवाद के शुरूआती दौर के कवि आते हैं|जहाँ तक बात ‘राष्ट्र’ की अवधारणा की है तो भूमि, जन और संस्कृति तीनों पक्षों को इस समय की कविताओं में शामिल किया गया है| स्वाधीनता आन्दोलन के दौरान राष्ट्रीय दायित्व लेखक की सृजन प्रक्रिया का अनिवार्य हिस्सा बन गया| प्रथम स्वतंत्रता आन्दोलन ने सभी क्षेत्रों पर व्यापक प्रभाव डाला था| उस समय जन चेतना की आग लहक रही थी| कोई भी उससे अछूता न था | इसमें महज राजनीतिक दृष्टि से राष्ट्र को नहीं देखा गया, वरन आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी व्याख्यायित करने की पूरी कोशिश की गयी| देश प्रेम, विदेशी सामानों का बहिष्कार, जन चेतना आदि भारतेंदु मंडल के कवियों की रचनाओं का मुख्य आधार था| ‘नीलदेवी’ नाटक में भारतेंदु लिखते हैं – ‘कहाँ करूणानिधि केशव सोये / जागत नहिं अनेक जतनकरि, भारतवासी रोये’| इससे स्पष्ट है कि ईश्वर का आह्वान किसी व्यक्ति के लिए नहीं बल्कि पूरे भारत के लिए किया जा रहा था|
‘भारतेन्दु युग का साहित्य अंग्रेजी शासन के विरूद्ध हिन्दुस्तान की संगठित राष्ट्रभावना का प्रथम आह्वान था| यही से राष्ट्रीयता का जयनाद शुरू हुआ| जिसके फलस्वरूप द्विवेदी युग ने अपने प्रौढ़तम स्वरूप के साथ नवीन आयामों और दिशाओं की ओर प्रस्थान किया| भारतेन्दु की ‘भारत दुर्दशा’ प्रेमघन की आनन्द अरूणोदय, देश दशा, राधाकृष्ण दास की भारत बारहमासा के साथ राजनीतिक चेतना की धार तेज हुई| द्विवेदी युग में कविवर ‘शंकर’ ने शंकर सरोज, शंकर सर्वस्व, गर्भरण्डारहस्य के अर्न्तगत बलिदान गान में ‘प्राणों का बलिदान देश की वेदी पर करना होगा’ के द्वारा स्वतन्त्रता प्राप्ति के लिए क्रान्ति एवं आत्मोत्सर्ग की प्रेरणा दी| ‘बज्रनाद से व्योम जगा दे देव और कुछ लाग लगा दे’ के ओजस्वी हुंकार द्वारा भारत भारतीकार मैथिली शरण गुप्त ने स्वदेश-संगीत व सर्वश्रेष्ठ सशक्त रचना भारत-भारती में ऋषिभूमि भारतवर्ष के अतीत के गौरवगान के साथ में वर्तमान पर क्षोभ प्रकट किया है| छायावादी कवियों ने राष्ट्रीयता के रागात्मक स्वरूप को ही प्रमुखता दी और उसी की परिधि में अतीत के सुन्दर और प्रेरक देशप्रेम सम्बन्धी मधुरगीतों व कविताओं की सृष्टि की| निराला की ‘वर दे वीणा वादिनी’, ‘भारती जय विजय करे’, ‘जागो फिर एकबार’, ‘शिवाजी का पत्र’, प्रसाद की ‘अरूण यह मधुमय देश हमारा’ चन्द्रगुप्त नाटक में आया ‘हिमाद्रि तुंगश्रृंग / से प्रबुद्ध शुद्ध भारती’ आदि कविताओं में कवियों ने हृदय के स्तर पर अपनी प्रशस्त राष्ट्रीयता की अभिव्यक्ति की है’|[i]
कविता की दूसरी धारा जो स्वतंत्रताके बाद आई उसमें आजादी के बाद के टूटे सपनों की गूंज है| देश जब तक विदेशी शक्तियों के अधीन था तब तक उसे मुक्त करने की लड़ाई चलती रही| विदेशी शक्तियों के जाने के बाद जिन तमाम मुद्दों को लेकर लड़ाईलड़ी गई थी उन्हें पूरा न होते देख रचनाकारों के मन में आग जल उठी| इस दौर के कवियों की कविताओं में सत्ता पर आसीन लोगों से प्रश्न किया गया. धूमिलके यहाँ तो जबरदस्त आक्रोश है|‘हर तरफ धुंआ है’ कविता में देश की वर्तमान अवस्था को बखूबी देखा जा सकता है –
‘हर तरफ धुआं है / हर तरफ कुहासा है / जो दांतों और दलदलों का दलाल है / वही देशभक्त है / अंधकार में सुरक्षित होने का नाम है- / तटस्थता / यहां कायरता के चेहरे पर / सबसे ज्यादा रक्त है / जिसके पास थाली है / हर भूखा आदमी / उसके लिए, सबसे भद्दी / गाली है / हर तरफ कुआं है / हर तरफ खाईं है / यहां, सिर्फ, वह आदमी, देश के करीब है / जो या तो मूर्ख है /या फिर गरीब है|’
धूमिल या अन्य समकालीन कवियों के यहाँ जो राष्ट्र का स्वरूप है वह आजादी के बाद सामान्य जन से जुड़ा है| देश में एक ओर भयानक अमीरी और दूसरी ओर भयानक गरीबी है| समकालीन कवि की चिंता गरीबों को लेकर है| देश का अर्थ इनके यहाँ देश की जनता है|
कविता की इन दोनों धाराओं से अलग हट कर देखें तो, आजादी से पहले कविता के क्षेत्र में एक और धारा दिखाई देती है, जिनके कवियों का जिक्र हिन्दी साहित्य के इतिहास में नहीं मिलता| इसलिए उन्हें तीसरी धारा कहना ठीक है| दरअसल, ये कवि भी उसी दौर में आते हैं जिनमें प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, नई कविता की धारा के अन्य कवि शामिल हैं| उनकी रचनाओं में राष्ट्र के स्वरूप को लेकर लम्बी चर्चा हर कहीं मिल जाएगी लेकिन, जब्त शुदा साहित्य के रचनाकारों का जिक्र बहुत कम देखने को मिलता है| लिहाजा, जब विषय ‘राष्ट्र’ हो तो इनका उल्लेख आवश्यक हो जाता है| ये ही कवि थे जिन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से साम्राज्यवादी ताकतों की नींद हराम कर दी थी|इन कवियों की कविताएँ ब्रिटिश राज द्वारा जब्त की गयी थी| उनकी कविता में इतना आकोश है कि साम्राज्यवादी शक्तियां बौखलाई हुई थी| ऐसे ही एक कवि थे –प्रह्लाद पाण्डेय ‘शशि’. इनके काव्य संग्रह हैं ‘विद्रोहिणी’ और‘तूफान’| इनका प्रकाशन वर्ष क्रमशः 1942 ई. और 1943 ई. है| इसमें ब्रिटिश सत्ता का खुल कर विरोध किया गया है| ये दोनों काव्य संग्रह जब्त घोषित किये गये थे| ‘विद्रोहिणी’ शीर्षक कविता में जबरदस्त आग है| विभिन्न धर्मों में फंसी मानवता छितराई पड़ी है | एक ओर भयानक अमीरी है और दूसरी ओर झोपड़ियों में बेसहारे लोग| कवि इनकी एकता की बात करते हैं –
‘सर्वधर्म की बंधी कब्र पर / नरता का सूर्योदय होगा / मंदिर – मस्जिद – गिरजों जैसा/ मानवता का पूजन होगा / यहाँ झोपड़ी और महल की / विषम व्यवस्था नहीं रहेगी / यहाँ नहीं धनवान रहेंगे / यहाँ गरीबी नहीं रहेगी|’[ii]
इन पंक्तियों को पढ़ कर सहज ही ज्ञात होता है किउनका उद्देश्य महज़ विदेशी शक्तियों को बाहर करना ही नहीं था वरन, वे एक ऐसे समाज का निर्माण चाहते थे जहाँ अमीर और गरीब सामान हों| जहाँ विभिन्न धर्मों के बदले मानवता का पूजन हो| कवि जानते हैं कि किसान और मजदूर समाज की नींव हैं| उनके श्रम के दम पर ही देश आगे बढ़ता है| उस युग में हो रहे शोषण के विरुद्ध वे आवाज बुलंद करते हैं| कहना न होगा कि अपनी आय में वृद्धि करने के लिए सत्ता ने करों की बाढ़ ला दी थी| ‘देश की बात’ पुस्तक में बाबूराव विष्णु पराड़कर लिखते हैं, ‘अंग्रेजी राज में किसानों के भयावह शोषण के कारण देश में बार – बार अकाल पड़ने लगे और लाखों किसान भूखमरी के शिकार होने लगे| देउस्कर ने लिखा कि 19 वीं सदी के आरंभिक वर्षों में भारतवर्ष में दस लाख आदमी अकाल के कारण भूख से मर गये| दूसरे पचीस वर्षों में और भी पांच लाख अभागे उक्त राक्षस की बलि चढ़े| सरकारी रिपोर्ट से मालूम होता है किसान 1850 से सन 1875 तक ब्रिटिश भारत में छह बार अकाल पड़ा| उससे पचास लाख भारतवासी पेट की ज्वाला से काल कवलित हुए|[iii]सदा से शोषित किसान, मजदूर अब विरोध पर उतर आए थे| ‘मातृ – वंदना’ शीर्षक कविता में कवि इस भाव को अभिव्यक्ति देते हैं –
‘जग का मैं पोषक किसान / ले द्रोहमयीहुंकार चलूँ माँ / मैं शोषित मजदूर विश्व का / जालिम को ललकार चलूँ माँ / रुद्ध कम्पिता मानवता में / नव जीवन के गीत भरूं माँ / सस्मित नर के हित साधन में / अपनासिर भी भेंट करूँ माँ.’[iv]
कहना न होगा कि देश की एक बड़ी आबादी भूख के कारन विवश थी| गरीबों के श्रम पर चढ़ कर धनिक अन्याय का तांडव कर रहे थे| राष्ट्र प्रेम का अर्थ वहां की जनता से होता है| भौगोलिक सीमा तो जन के बाद आने वाली चीज है| कवि प्रह्लाद पाण्डेय ‘शशि’ इसे भली भांति पहचानते हैं –
‘कैसी अग्नि शिखाएं उठतीं / भूखे नर के अभ्यंतर से / मुझसे पूछो ! मुझसे पूछो !!/ स्वयं देख लो दुनियां भर में !!!/ इन महलों की ईंट – ईंट में/ नरता का बलिदान चढ़ा है / शोषित मजदूरों के शोणित / से इनका सम्मान बढ़ा है./ तुम से कुछ भी द्वेष नहीं है / ओमहलों में पलने वालों ! / किन्तु युगांतर बोल रहा है / रोते नर को गले लगा लो.’[v]
इसी प्रकार, उनकी‘कवि के प्रति’ कविता में स्वछन्द जीवन की कामना की गयी है –
‘जल उठे अंगार जल में, विश्व का हो सृजन नूतन / कवि! सुनाओ तान ऐसी, आज हो स्वच्छंद जीवन / पद दलित शोषित मनुज दल / जो बना जर्जर भिखारी / फेंक भिक्षा पात्र दे निज / मुक्ति लाए क्रन्तिकारी.’[vi]
कवि जन – जन में चेतना भरने का प्रयत्न करते हैं| जन ही राष्ट्र का प्राण है| वे विदेशी शक्तियों से आक्रांत, बेबस – बेसहारे समुदाय का चित्र बड़े मार्मिक शब्दों में करते हैं-
‘लोहे के करघों पर लटकीं/ क्षीण तड़फती लाशों को देखो / खेत की मिट्टी से उठती / कंकालों की आहें देखो / दो दिन के भूखे प्यासे / मानव की कृष काया देखो / टूटेआंसूके टुकड़ों में / फूटे दिल की छाया देखो.’[vii]
राष्ट्र की गरीबी का चित्रण ‘देश की बात’ पुस्तक से ज्ञात होता है| सखाराम गणेश देउस्कर लिखते हैं, ‘जिस देश की 28 कोटि प्रजा में 10 कोटि दुर्भिक्ष के दिनों में आध पेट खाकर बिताती है और दुर्भिक्ष के दिनों में जिस देश के मृतकों की गिनती लाखों में की जाती है| जिस देश को खुद भारत सचिव ने भी very verypoor country ( बहुत – बहुत गरीब देश ) कहा है, वहां का शासन कार्य जितने कम खर्चे में हो सके, उतना ही अच्छा है.[viii] इसी दृश्य को प्रह्लाद पाण्डेय ‘देख सको तो मानव देखो’ शीर्षक कविता में प्रस्तुत करते हैं –
‘फटे हुए चिथड़ों में लिपटी / आज सलज्जा नारी देखो / झुकी हुई ग्रीवा के आगे / क्रूर बधिक की आरी देखो / जलि हुई उजड़ी बस्ती में / उन्नति और पराभव देखो / देख सको तो मानव देखो.’[ix]
कवि शोषकों की तुलना क्रूर भेदियों से करता है| ये शोषक ही असल में देश को अवनति के पटल में ले जाते हैं| जिनके दम पर राष्ट्र फलता – फूलता है वे यही श्रमशील समाज है-
‘जिनकी एक एक हड्डी पर / तेरे ऊँचे महल खड़े हैं / जिनके रक्त मांस के बल पर / राज – मुकुट में रत्न जड़े हैं / भूखे रहकर भी वे तेरा / राज कोष भरते रहते हैं / मरण सेज पर पड़े हुए भी / जुल्मों को सहते रहते हैं .’[x]कुल मिला कर हम यह कह सकते हैं कि राष्ट्र की अवधारणा में भौगोलिक सीमा से अधिक जन का महत्त्व प्रह्लाद पाण्डेय ‘शशि’ के यहाँ अधिक दिखाई देता है| इसके अतिरिक्त उनकी अन्य कविताओं में देश के मर मिटने वाले दीवानों के यश का भी गायन किया गया है| विदेशी सत्ता के प्रति आक्रोश है और देशवासियों की मुक्ति का आह्वान किया गया है| उनके प्रखर और बेबाक शब्दों से तिलमिलाई साम्राज्यवादी शक्तियों ने उनके काव्य संग्रह को जब्त घोषित कर दिया था|आधुनिक काव्य धारा राष्ट्र के स्वरूप की चर्चा करते हुए इन कवियों की कविताओं की चर्चा करना इस दृष्टिकोण से आवश्यक है|
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[i]https://vimisahitya.wordpress.com/2009/02/02/rashtriy_kavyadhara/
[ii]रॉय, रुस्तम: प्रतिबंधितहिन्दी साहित्य– भाग 2 ; राधाकृष्ण प्रकाशन, दरियागंज, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 1999पृष्ठ संख्या 137
[iii]देउस्कर, सखाराम गणेश : देश की बात, नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया, संस्करण 2010 पृष्ठ संख्या : 21
[iv]रॉय, रुस्तम: प्रतिबंधितहिन्दी साहित्य– भाग 2 ; राधाकृष्ण प्रकाशन, दरियागंज, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 1999पृष्ठ संख्या 138
[v]रॉय, रुस्तम: प्रतिबंधितहिन्दी साहित्य– भाग 2 ; राधाकृष्ण प्रकाशन, दरियागंज, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 1999पृष्ठ संख्या 141
[vi]रॉय, रुस्तम: प्रतिबंधितहिन्दी साहित्य– भाग 2 ; राधाकृष्ण प्रकाशन, दरियागंज, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 1999पृष्ठ संख्या 146
[vii]रॉय, रुस्तम: प्रतिबंधितहिन्दी साहित्य– भाग 2 ; राधाकृष्ण प्रकाशन, दरियागंज, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 1999पृष्ठ संख्या 150
[viii]देउस्कर, सखाराम गणेश : देश की बात, नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया, संस्करण 2010 पृष्ठ संख्या : 177
[ix]रॉय, रुस्तम: प्रतिबंधितहिन्दी साहित्य– भाग 2 ; राधाकृष्ण प्रकाशन, दरियागंज, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 1999पृष्ठ संख्या 150
[x]रॉय, रुस्तम: प्रतिबंधितहिन्दी साहित्य– भाग 2 ; राधाकृष्ण प्रकाशन, दरियागंज, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 1999पृष्ठ संख्या 150