डॉ.रीता दास राम मूलतः महाराष्ट्र के नागपुर की रहने वाली है। हिन्दी साहित्य से इन्होंने पीएच-डी. की शिक्षा प्राप्त की है। हिन्दी साहित्य की अध्येता होने के नाते इनका साहित्य से भी गहरा जुड़ाव है। लमही , गंभीर समाचार, मनस्वी , आजकल, व्यंजना, जीवन प्रभात, वागर्थ, सृजनलोक, दुनियां इन दिनों, शब्द प्रवाह सहित कई पत्र -पत्रिकाओं एवं वेबसाईट में कहानी और कविता का प्रकाशन हो चुका है। कवियों द्वारा संकलित गौरेया, शब्द प्रवाह, समकालीन हिन्दी कविता भाग-1, साहित्यायन, मुंबई की कवित्रियां आदि विषेशांको में भी इनकी रचनाओं ने स्थान पाया है। तृष्णा और गीली मिट्टी के रूपाकार नामक कविता संकलन का भी प्रकाशन हो चुका है। इसके अलावे इन्हें कई सम्मानों से भी नवाजा गया है। यहाँ प्रस्तुत है  डॉ.रीता दास राम  द्वारा असगर वजाहत की कृति सात आसमान पर केंद्रित लेख – ”  इतिहास के पन्नों से गर्द हटाता – सात आसमान”  . . . . संपादक 

                   इतिहास के पन्नों से गर्द हटाता – ‘सात आसमान’
                                   डॉ. रीता दास राम
इतिहास गुजरते समय की ठहरी हुई बतौर साक्ष्य वह सच्चाई है जिसे कोई ख़ारिज नहीं कर सकता। यह वह आईना है जिसमें हम बीते युगों को सविस्तार देख सकते हैं। उसकी गति का विवरण ले सकते है। उस शब्द चित्र को छू सकते। आत्मसात कर सकते है किन्तु मिटा नहीं सकते। हाँ, इसके कारण भविष्य में सकारात्मक बदलाव की संभावना बढ़ जाती है।
‘इतिहास’ मानव और समाज से संबंधित ज्ञात घटनाओं का व्यवस्थित, सार्थक, सुसंबद्ध वर्णन है। आज अध्ययन और विकास के लिए इतिहास के तथ्यों और घटनाओं की सटीक जानकारी निहायत जरूरी है।
असगर वजाहत की लेखनी मार्गदर्शन की भूमिका निभाती है। विचारों द्वारा वे समाज का विश्लेषण करते हैं। अपनी कहानियों द्वारा सामाजिक समस्याओं और उलझनों को समझाने व सुलझाने का रास्ता बताते रहे हैं। वें अपने विचार को आरोपित नहीं करते अपितु मनन व अवलोकन हेतु महत्वपूर्ण दिशा का इशारा छोड़ जाते हैं। पाठक समझदार है निष्कर्ष तक उसे खुद आना है। वें अपनी रचनाशीलता द्वारा समाज को आगाह करने की ज़िम्मेदारी बखूबी निभाते हैं।
साल 2018 में ‘संचयन – असगर वजाहत (पहला भाग)’ में उपन्यास ‘सात आसमान’ प्रकाशित हुआ। उसके बाद उसी पुस्तक में आख्यान ‘बाक़र गंज के सैयद’ है। कहानी और उपन्यास की सीमा को आगे बढ़ाता आख्यान, नई दिशा की ओर संकेत करता है। ‘सात आसमान’ को पढ़ना इतिहास पढ़ना है। वह इतिहास जिसे हम जानते हैं। आदरणीय असगर वजाहत जी ने उसे शब्द दिया है, घटनाएँ दी, माहौल दिया, उन पलों को गुथा हैं जिसे इतिहास में हम दबा छुपा पड़ा महसूस करते हैं। इतिहास के साथ चलते चलाते वे हमें संस्कृति के दर्शन और उसके बदलाव से रू-ब-रू कराते हैं। परिवर्तन को वे परिदृश्य से जोड़ते तो हैं ही समाज के सड़े-गले हिस्से को भी दर्शाने से नहीं चूकते। समस्या को समस्या की तरह रखते हैं तो बदलते मोड़ को भी आत्मसात करते आगे भी बढ़ते हैं। ‘सात आसमान’ मानवीय समाज के विभिन्न अंगों में उतार-चढ़ाव के उन महत्वपूर्ण पक्षों को जोड़ता है जिससे गुजर कर ही संस्कृति वर्तमान तक पहुँची है। चाह कर भी जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। उपन्यास में इतिहास के भीतरी दर्रों से दिखाई देती दबी हुई टीस, हादसों की वेदना, व्यावहारिक वार्तालाप, जीने के तरीके, विचारों पर की खरौंच, अभिशाप सा जीवन, समाज का रुतबा, सदी के ढलान की मूक पुकार को स्वर दिया गया है जिसकी ध्वनि हम सुन सकते हैं।
उपन्यास यह एक छोटा सा शब्द है जो ‘सात आसमान’ से गुजर कर विस्तृत और विशाल होता जाता है। जिस पर चलकर हमारे ऐतिहासिक संदर्भ थोड़ा रुकते हैं और हमें तृप्ति का एहसास दिलाते हैं। उपन्यास में किस्से और पात्रों की सघनता ऐसी जो हर शब्द पर रुक रुक कर साँस लेने की प्रतीक्षा करते हैं। देश और संस्कृति की पुरातनकालीन व्यथा जो सुनते आए हैं इस उपन्यास में हम देखते हैं। वे लोग जिनके पुरखे कभी बाबर के साथ आए, अवध के एक इलाके में गाँव बसाया, जमींदार हुए, खानदानी, ईरानी, यह उपन्यास उनकी कथा है। संपादक पल्लव जी के अनुसार, “असगर वजाहत की ख़ोज यह ऐसा काफिला है जो मुगलों के साथ फ़ारस से हिंदुस्तान आया और यहीं का होकर रह गया।”(पृष्ठ 10)यह संक्रमण का संकट नहीं बल्कि प्राकृतिक मिलावट का दृश्य प्रस्तुत करता है जिसे मानव मस्तिष्क बड़ी मुश्किल से अपनाता है। अपनाता भी है तो तमीज़ और तहजीबें दूषित हो जाती हैं। उपन्यास का उद्देश्य बीते युग पर प्रकाश डालना, वैचारिक ऊर्जा को पोषित करना, सांस्कृतिक उपादेयता, पीढ़ियों के अच्छे-बुरे को सम्मुख लाना, सदियों से गुजरना एवं उस समय का शब्द चित्र अंकित करना है जिसे अतीत कहते हैं। ‘सात आसमान’ हमें वह दृश्य दिखाता है जिसकी हमने कभी अधूरी सी शायद कल्पना भर की होगी। यदि हमने अतीत के दर्द को सुना था तो इस उपन्यास में हम उस दर्द से गुजरते हैं।
‘सात आसमान’ अब्बा मियाँ की कथा है। जो कई पात्रों से पूरी होती है। पात्रों की छोटी छोटी कहानियाँ जुड़कर उपन्यास रोचक होता चला जाता है। शुरुआत पिछले पाँच सौ सालों का इतिहास रचती आगे बढ़ती है। पाठक देखते हैं प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है। उपन्यास इसका बयान है। ‘सात आसमान’ वाजिद अलीशाह के दौर की घटनाओं और कहानियों से शुरू होता है जिसे लखनऊ के अब्बू साहब बताते हैं। अब्बा मियाँ से मिलने आए अब्बू साहब कभी वापस नहीं जा पाते। मुंशी बन उनके पास ही रह जाते हैं। अब्बू साहब अंग्रेजों के किस्से सुनाते, घटनाओं को कहानी की तरह पिरोते, बतियाते उपन्यास को आगे बढ़ाते है।
उपन्यासकार ने साधारण लोगों के जीवन को भी शब्द दिए हैं। नौकर एक अकेला नहीं पूरा परिवार होता था। जिनके बिना जमींदारी भी अधूरी है। जमींदारी की दुनिया, नौकरशाहों का रुतबा, नौकरों का जीवन, मुट्ठी में बंद उनके अधिकार, अपमानों से भरे जीवन के पड़ाव, पारिवारिक स्थिति, षडयंत्र, सामाजिक-राजनैतिक पैतरें, जीने की मजबूरी, जायज-नाजायज रिश्तों की कील, गरीबों और रंडियों के जीवन के सच इतिहास के पन्ने खोल कर रख देती है जैसे कह रही हो हमाम में हर कोई नंगा होता है। यही यह इतिहास है जिसे हमारी पीढ़ियाँ जीती आई है और आज हमारे ऊपर उसकी प्रतिछाया है।
क्यों जरूरी हो जाती है एक ऐतिहासिक उपन्यास की रचना। मूल को प्रस्तुत करना। इतिहास पर से मिट्टी झाड़ना। यह एक मूक उद्देश्य है जो पाठक सुनता है। प्रश्न को बुनते पाठक पात्रों की पारिवारिक दाँव-पेंच, षडयंत्र, जमींदारी की राजसी ठाठ, ब्याहता छोड़ रखैल के किस्से, मुंशी, माली से लेकर पंखा झलने वाले नौकरों की दिनचर्या का ब्यौरा सुनते अर्थ बुनता है। जैसे गुजरी सदी के समाज को उधेड़ कर सामने लाना, दिखाना है।
लेखक का जो उद्देश्य है उसे वह पूरा कर रहा है। रिश्तों की असफल कामानाएं, बेगमों की तानाशाही के पीछे छिपा डर, सहूलियतों की असलियत, दूसरी औरतों की मजबूरी, जख्म बन उतरती उनकी पेचीदगियाँ पता ही नहीं चलता जिंदगी में कब उलटे खड़ी हो जाती है।
रिश्तेदारों और नौकरों के बीच गहरे संबंध, उनके पलते परिवार, उजड़ते-बिखरते संबंधों के किस्सों, यादों, हादसों को जोड़ उस सदी के ऐतिहासिक माहौल को लेखक हर छोटे छिद्र से दिखाते है जो नाटकीय तो बिलकुल नहीं लगता अपितु गहरे कुंए में परत-दर-परत उतरने का बोध कराता है। जो तसल्ली के साथ बीतती सदी के परिवर्तन को दर्ज करता है। बदलाव सादृश्य सुकून देते है। इतिहास से गुजरते पाठक उपन्यास को छोड़ नहीं पाता क्योंकि सिलसिलेवार किस्सों की बिना अनुमति पेशकश है जो कौतूहल को पोषित करती अपनी जमीं के ऐतिहासिक हादसों से रू-ब-रू कराती चलती है। यह पूरी तरह मुसलमानों के भारत आकर बसने की कथा है जो बाहर से हिंदुस्तान आई है। कई पीढ़ियाँ यहीं रह कर जिंदगी बसर करती है और नई पीढ़ी विदेश चली जाती है। यह और कुछ नहीं विकास की बढ़त है। अपने अपने स्तर से जिंदगी में इस बढ़त का स्वाद हर कोई चखता है। नई पीढ़ी क्या वापस आएगी या विदेश में बस जाएगी कोई नहीं जानता। हम अतीत को बुन सकते हैं भविष्य को नहीं। मजबूरी, जरूरत और समय इंसान को रास्ते की धूल की तरह कहाँ उड़ा ले जाएँगे पता नहीं चलता और हम इंसान हैं कि इंसान को कोसते रह जाते हैं।
अवध से मुल्कबदर हुए मोतमुद्दौला गाजीउद्दीन हैदर के वजीरे आलम थे। शाही खजाने की चाबी उनकी जेब में थी। हुक्मेशाही उनकी जुबान था। बेगमें उनके रहमो-करम पर थीं। शहजादे को उन्होंने कभी नज़रबंद कर कभी रखा था। बादशाह को नशे की लत से कभी ऊपर आने नहीं दिया ताकि सत्ता उनकी रहे हुकूमत चलती रहे। अपने दुश्मनों के साथ उन्होंने ऐसा सुलूक किया था कि लोग काँप जाते थे। अवध में उनकी तूती बोलती थी लेकिन अमरपट्टा कौन लिखाकर आता है। आखिर कभी तो बिल्ली के गले में घंटी बँधनी ही थी। मुल्कबदर होने के बाद मोतमुद्दौला ने मशहूर सेठ राम नारायण से एक सफेद कोठी खरीदी और अवध से बाहर चले आए। राम नारायण ने इस कोठी को अपनी रखैल और अंग्रेज़ दोस्तों की खातिरदारी के लिए बनाया था। उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य कोठी के पास बेटी और दामाद के लिए एक इमारत बनाई गई जिसे महल कहा जाता है। सौ साल बाद लड़की और दामाद से जुड़े पचास-साठ लोग उसमें रहने लगे जो आपस में रिश्तेदार थे। एक कट्टर शासक आम लोगों को लूट-खसोट कर इतना अर्जित कर लेता है कि उसकी पीढ़ियाँ दशकों तक हिस्सा बटाती रहती है। यह घृणित सत्य है। तानाशाही और क्रूरता पोषित ना हो यह अनिवार्यता नियम हो और समाज बचा रहे।
राजा-बादशाहों के बाद अंग्रेजों का राज चला। आम जनता जमींदारी और अंग्रेजों के शासन के तरीके और बारीकियों से त्रस्त थी। “मियाँ, अंग्रेजों का दिमाग ऐसा है कि वो सब कुछ हो जाते हैं, पागल नहीं होते। मियाँ पागल होते तो ऐसी सल्तनत बनाते जहाँ सूरज नहीं डूबता। अकल के पुतले हैं, कमबख़्त। उनका मुल्क क्या है? मियाँ, नक्शे पर देखो तो चिड़िया बराबर। और अंग्रेज़ दुनिया में कितने हैं? मुट्ठी भर। लेकिन इन्होंने सारी दुनिया को तिनगी का नाच नचा दिया।” (पृष्ठ 165) युग बदला। डेढ़ सौ साल बाद समय ने करवट बदली। तय था अंग्रेजों का शासन डोल रहा था और कांग्रेस पर लोगों का विश्वास प्रश्न बनकर खड़ा था। “अंग्रेजों के जाने के बाद यहाँ हुकूमत कौन करेगा? कांग्रेसी?
लाहौलविलाकुव्वत। अरे साहब, हुकूमत चलाना हँसी खेल नहीं है। ये दुकानों के सामने पालथी मारकर बैठ जाना, चर्खा कात लेना, जेल चले जाना दूसरी बात है और हुकूमत चलाना कुछ और है।” (पृष्ठ 166) अंग्रेज़ चले गए। जमींदारी धीरे धीरे चली गई। रोब-दाब भी जाता रहा।
अब्बा मियाँ का कहना था जमींदारी कांग्रेस ने खत्म की और वे कांग्रेस के पक्के दुश्मन हो गए। अब्बा मियाँ की हमदर्दी पाकिस्तान के साथ थी। उनसे पूछने पर कि आप पाकिस्तान क्यों नहीं चले जाते… वहाँ आपको जमींदारी मिलेगी। जवाब के बदले उनका सवाल बड़ा लंबा था, “जनाब ये पाकिस्तान किस चिड़िया का नाम? …. जमींदारी, आप समझते हैं क्या है?
गुड्डे-गुड़ियों का खेल नहीं है जमींदारी। हम यहाँ जमींदारी करते थे तो इसलिए कि दो सौ साल से हमारा खानदान यहाँ रह रहा है। चप्पे-चप्पे से वाकफियत है। हजारों मिलने वाले और सैकड़ों दोस्त है। यहाँ की जुबान और लोगों से वाकिफ़ हैं, वो हमसे वाकिफ़ हैं … अगर बिलोचस्तान में मुझे जमींदारी मिल भी गई तो मैं कर सकता हूँ? जमींदारी एक आदमी के बस का रोग तो है नहीं। न मैं उन लोगों को जानूँ, न मैं उनकी जुबान जानूँ और ना वो मेरी जुबान जाने … न वहाँ मेरे दोस्त, न ताल्लुकात … तो जनाब मैं वहाँ जमींदारी करूँगा या जूते खाऊँगा।” (पृष्ठ 169) जमींदारी जाती रही। नौकरों ने धोखा देना शुरू किया। जमीन नहीं बची। खेत नहीं रहे। गोदाम बिक गया। इमारत बिक गई। साफ था जमींदारी बिना नौकरों-चाकरों, सगे-संबंधियों और जान-पहचान वालों के नहीं चलती। शासक बदले। शहर की तस्वीर बदलने लगी। बँटवारे के बाद शहरों में फसाद होने लगे। हिन्दू, मुसलमान, चमार, बेलदार, भड़भूँजा, तेली, शेख सबने मिलजुल कर मुक़ाबला किया। राइफल, पिस्तौल, असहले, पत्थर समेट कर अपनी छतों पर मतलब कि अगर कोई नुकसान पहुंचाने आया तो उसे सख्त जवाब दिया जाएगा … चाहे हिन्दू हो या मुसलमान। लोगों ने एक होना सीखा। अपने क्षेत्रों की रक्षा की। समाज बदलने लगा। परिस्थितियाँ बदली। अब लोग अपने बच्चों को पढ़ाने लिखाने लगे। संयुक्त परिवार टूटने लगा। नौकरी रहने के जगह तय करने लगी। बच्चे शहरों में मस्त और माता-पिता अपनी जमीं से जुड़े तड़पते रहे। अशिक्षा और अज्ञानता ने अम्माँ का कैंसर बढ़ाया। अम्माँ ने अंतिम साँसे अपने मैके में ली। अब्बा ने बच्चों की दूसरी दुनिया महसूस की। बच्चों का घर छोड़कर जाना देखा। अब्बा घर में अकेले रह गए। अम्माँ की याद में तड़पते उसी कमरे में आखरी रात गुजारी जहाँ अम्माँ अपने आखरी दिनों में थी। यह पीढ़ी भी खत्म हुई। जाने कितने आसमान हुए और चले गए। जिंदगी भर का साथ किसका, कहाँ होता है …. सबकी एक ही राह है।
‘सात आसमान’ में सामाजिक जीवन के भीतर की दुनिया, मानसिक द्वंद्व, कश्मकश को विस्तार पूर्वक प्रस्तुत किया गया है। उपन्यास जीवन के उस पक्ष की भी व्याख्या करता है जो कभी उपेक्षित होती रही। क्रूर अगर शब्द है तो उपन्यास उससे जुड़ी घटनाओं की बर्बरता जीने और उसे घटते समय होने वाली मानसिक प्रताड़ना को समझाने की कोशिश है।
सत्ता के लिए लालसा मोतमुद्दौला को मनुष्य से हैवान बनाती है। सत्ता का लालच कोई रिश्ते नहीं बख़्शता उपन्यास में इसके उदाहरण भरे पड़े हैं। मूल्यों का बनना बिगड़ना और नए मूल्यों की स्थापना से होने वाले परिवर्तन दृष्टव्य है जो सदी का अंतर है। मूल्यों के बदलाव की टीस भी है। आज मानव मूल्यों की परवाह कम है। मानव अपने समय की स्थिति जीता है। कथा में अत्याचार की हद भी है। मानवता की पूजा भी है। लक्खू अपने चाचा से जुबैदा के केस के लिए कोर्ट में लड़ता है। फिर भी चाचा के मरते समय अकेले पड़ते चाचा का हाथ थामने से लक्खू पीछे नहीं हटता। यहाँ परिवार के लिए सद्भावना दिखाई पड़ती है। वहीं जुबैदा और सत्ती के साथ किए दुर्व्यवहार से समझ आता है बदले की भावना मानवता को नहीं पोसती। मुस्लिम समाज, उनकी संस्कृति, रहन-सहन के तौर तरीके, सलीके, उनके नियम-कानून, रिश्तों की पेचीदगी, साज-संभाल उपन्यास में स्थान पाते हैं। बड़ों का मान-सम्मान, आदर, सेवा सत्कार छोटों के लिए स्नेह दुलार लेखक सब पर लेखनी चलाते हैं तो उनका प्रकृति से प्रेम भी भरपूर नज़र आता है। उपन्यास पढ़ने के बाद भी कुछ बातें बरबस याद आती जैसे जाड़ों में पलंग के नीचे अंगीठियाँ रखना, भुनी हुई कच्ची कैरियों का शर्बत, बारिश के बाद केंचुओं और बीरबहूटियाँ से भरी जमीन, पेड़ों की फुनगियों को छूते बादल, गर्मी में कच्ची आँगन में पानी का छिड़काव आदि। यहाँ जाड़े की सर्द के साथ बारिश की बौछार है तो जेठ की तपती दोपहरी भी। शब्दों में उर्दू के शब्द बहुतायत से मिलते लुभाते हैं। भाषा सरलता से आत्मसात होती घटनाओं के मर्म से जोड़ती है। कुछ घटनाएँ दिल जुड़ा जाती है। उनका जिक्र बाद में भी याद आता है। गर्मियों में खजूर का पंखा, इकरामुद्दीन की भवें, साल में एक बार ठहरे हुए पानी में कंकर गिरना, इमामबाड़ा की ऊँची छत, उड़ाऊ-खाऊ नाना और गुड़ियों की शौकीन कंजूस नानी, उनसे मिलती अशर्फी, अंग्रेजों का हिंदुओं के सामने पीपल की डगाल काटना और मुसलमानों से रास्ता बदलवाकर दोनों तरफ से जय-जयकार करवा लेना, चाकू से मुर्गे की चोंच तेज करना, दरकिनार किए जाते जानी मियाँ, अब्बा का अपनी बनाई इमारत की एक एक पक्की ईंट और लोहे निकलते महसूस करते हुए भी इमारत को बेचना। अब्बा मियाँ नेकनामी और सदाचार के उदाहरण हैं। नौकर, रिश्तेदार, मित्र, पहचान वाले सबकी पसंद का ख्याल रखते हैं। आश्चर्य होता है उसी समाज में मोतमूद्दौला जैसा उदाहरण भी मौजूद है। स्पष्ट है कि परिस्थिति और समय इंसान को रचते है। यह मुस्लिम समाज के हिंदुस्तान में स्थापित होने की गाथा है जिसे अल्पसंख्यक कहा जाता है। उपन्यास के शुरुआत में लेखक लिखते हैं, “कुएं जैसी ठहरी, गठी हुई जिंदगी के चेहरे जिसे कोई नहीं लिख सकता।” (पृष्ठ 19) फिर भी ‘सात आसमान हमारे हाथ में है। उपन्यास पढ़कर ये पंक्ति बरबस मेरी जुबान पर आती है-इतिहास की तलहटी में समय चाँदी की तरह चमकता है।

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