लेख / डॉ.रीता दास राम – हिन्दी साहित्य में आलोचना के शिखरपुरुष डॉ. नामवर सिंह

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डॉ.रीता दास राम मूलतः महाराष्ट्र के नागपुर की रहने वाली है। हिन्दी साहित्य से इन्होंने पीएच-डी. की शिक्षा प्राप्त की है। हिन्दी साहित्य की अध्येता होने के नाते इनका साहित्य से भी गहरा जुड़ाव है। लमही , गंभीर समाचार, मनस्वी , आजकल, व्यंजना, जीवन प्रभात, वागर्थ, सृजनलोक, दुनियां इन दिनों, शब्द प्रवाह सहित कई पत्र -पत्रिकाओं एवं वेबसाईट में कहानी और कविता का प्रकाशन हो चुका है। कवियों द्वारा संकलित गौरेया, शब्द प्रवाह, समकालीन हिन्दी कविता भाग-1, साहित्यायन, मुंबई की कवित्रियां आदि विषेशांको में भी इनकी रचनाओं ने स्थान पाया है। तृष्णा और गीली मिट्टी के रूपाकार नामक कविता संकलन का भी प्रकाशन हो चुका है। इसके अलावे इन्हें कई सम्मानों से भी नवाजा गया है। इन्होंने हाल के दिनों में दिवंगत हुए आलोचक डॉ. नामवर सिंह के साहित्यिक जीवन को याद करते हुए लिखा है- ‘हिन्दी साहित्य में आलोचन के शिखर पुरूष नामवर सिंह।’ -संपादक 

                      हिन्दी साहित्य में आलोचना के शिखरपुरुष डॉ. नामवर सिंह
                                       – डॉ. रीता दास राम
हिन्दी साहित्य जगत के प्रतिष्ठित आलोचक डॉ. नामवर सिंह जिन्हें आलोचना का ‘शिखर पुरुष’ कहा जाता है। आलोचना नामवर सिंह का कर्म धर्म था जिसे उन्होंने पूरी शिद्दत से निभाया और निभाते रहे। आलोचना में उन्होंने सिर्फ पुराने मूल्यों और सिद्धांतों पर ही अपनी बात नहीं की अपितु नए प्रतिमान स्थापित किए। नई पीढ़ी के लिए पथ-प्रदर्शक की भूमिका भी निभाई। वे हमेशा नए शब्दों की तलाश में जुटे रहते। हिन्दी साहित्य आलोचना में उनकी पकड़ वह हस्ताक्षर है जिसका कोई सानी नहीं। हिन्दी साहित्य को उनकी सक्रियता ने एक नया मार्ग प्रशस्त कराया। नामवर सिंह का जाना हिन्दी साहित्य जगत की बहुत बड़ी क्षति है। आज वे हमारे बीच नहीं हैं। 19 फरवरी 2019 को दिल्ली के एम्स में उन्होंने आखरी साँस ली लेकिन हिन्दी साहित्य में उनकी उपस्थिती सदैव अमर रहेगी। अभी-अभी हमने कृष्णा सोबती जी को खोया और अभी नामवर जी का जाना बहुत दुखद है। पिछले दिनों पर नज़र डाली जाय तो इतने कम समय में कुँवर नारायण, केदारनाथ सिंह और विष्णु खरे को मिलाकर पाँच विभूतियों को खोना हिन्दी साहित्य जगत के लिए बड़ा आघात है। वे सभी साहित्य में अपनी महत्वपूर्ण उपलब्धि के लिए जाने जाते रहे।
हिन्दी साहित्य की चर्चा नामवर सिंह जी के बिना अधूरी है। उनका रचनाकर्म हिन्दी साहित्य के लिए अमूल्य योगदान है। वे एक प्रखर वक्ता थे। उन्हें पाठक वर्ग, विद्यार्थी और हिन्दी साहित्य जगत से जुड़ा हर व्यक्ति सुनने, देखने के लिए हमेशा लालायित रहता था। व्याख्यान देना उनका सामाजिक जीवन रहा। जिसे वे बहुत पसंद करते थे। जिसके लिए वे भारत के कोने-कोने एवं विदेशों में भी बुलाए जाते रहे। बनारस का जीयनपुर गाँव उनका जन्मस्थान है। बनारस को वे बहुत पसंद करते थे। बनारस की पहचान पान खाना उनका भी प्रिय शौक था। नामवर सिंह जी ने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से अपनी एम.ए और पीएच-डी. की शिक्षा पूरी की। हजारी प्रसाद द्विवेदी को वे गुरुदेव मानते थे। ‘हिन्दी विकास में अपभ्रंश का योग’ और ‘पृथ्वीराज रासो की भाषा’ इन दो विषयों पर उन्होंने शोध कार्य किए। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में वे टेंपररी लेक्चरर भी रहे। उनकी मुख्य रचनाओं में आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ, छायावाद, इतिहास और आलोचना, कहानी : नई कहानी, कविता के प्रतिमान, दूसरी परंपरा की खोज, वाद विवाद संवाद के अलावा साक्षात्कार, पत्रसंग्रह, व्याख्यान एवं संपादित पुस्तकों का बड़ा जखीरा वे पीछे छोड़ गए जो साहित्य प्रेमियों का मार्गदर्शन कराता रहेगा। वे कहते थे किताबें मेरी पूँजी है। वे कम्युनिस्ट विचारधारा से जुड़े। बनारस विश्वविद्यालय से कार्यमुक्त होकर वे सागर विश्वविद्यालय से जुड़े। बनारस में रहकर स्वतंत्र लेखन भी किया। ‘जनयुग’ साप्ताहिक व ‘आलोचना’ त्रैमासिक से संपादक रूप में जुड़कर उन्होंने कार्य किया। उसके बाद जोधपुर विश्वविद्यालय के विभागाध्यक्ष भी बने। साहित्य अकादमी सम्मान, हिन्दी अकादमी का शलाका सम्मान, साहित्य भूषण सम्मान, शब्द साधक शिखर सम्मान एवं महावीर प्रसाद द्विवेदी सम्मान आदि कई सम्मानों से सम्मानित नामवर सिंह जी जेएनयू में हिन्दी के प्रोफेसर के लिए नियुक्त हुए। इतना ही नहीं उनकी पूरी जिंदगी रचनाकर्म को समर्पित रही।
साहिय में उनकी शुरुआत बनारस की ‘क्षत्रियमित्र’ पत्रिका में कविता से हुई। ‘पृथ्वीराज रासो की भाषा’, ‘हिन्दी विकास में अपभ्रंश का योग’ पर उनके शोध, एम.ए. करते हुए छायावाद जैसा रचनात्मक कर्म एवं उनकी अन्य कृतियों से हम साहित्य पर उनकी गहरी पकड़ को देख सकते हैं। नामवर जी का कहना था साहित्य में जो मूल्यवान है उसकी रक्षा होनी चाहिए। आलोचना इसका सबसे अच्छा साधन है। जिसमें हम अपने अतीत की गौरवशाली गरिमाय परंपरा की रक्षा कर सके। वे नई पीढ़ी को नई अर्थवत्ता प्रदान करने के हिमायती थे। उनका कहना था आजादी के बाद बाढ़ की तरह आए लेखन में कचरा और सुंदर फूल दोनों आए हैं जिसमें से सार्थक को अलग करना चाहिए। उनके अनुसार कवि रचनाकर्म द्वारा जब कोई जोखिम उठाता है तो उस पर आलोचक की भी ज़िम्मेदारी बड़ी हो जाती है। कविता के लिए उनका कहना था आज कविता सिर्फ संवेदना नहीं समझदारी की मांग रखती है। कवि को जितनी लोक हृदय की पहचान की जरूरत है उतनी ही कवि को समझने के लिए भी लोक हृदय की पहचान को वे जरूरी और महत्वपूर्ण मानते थे। अन्यथा कवि को समझना मुश्किल है। उनका कहना था लोक हृदय ही हिम्मत देता है। जोखिम उठाने के लिए ताकत देता है, चुनौती देता है, ललकारता है। नामवर सिंह जी के जीवन के पचहत्तर साल पूरे करने पर मुंबई विश्वविद्यालय में डॉ. रतन कुमार पाण्डेय द्वारा आयोजित अभिनंदन समारोह में सभी को संबोधित करते हुए वे कहते हैं, “लोक हृदय की पहचान तभी होगी जब आपके हृदय का बहुत बड़ा हिस्सा गाँव में बीता हो। आधा गाँव में नहीं। मराठी में बंबई को भी लोग गाँव ही कहते हैं। बाहर गाँव जा रहे हैं तो बंबई से बाहर जा रहे हैं। बड़ा अच्छा लगता है कि इस महानगर को भी लोग गाँव ही कहते हैं। काश! मैं दिल्ली को भी गाँव कह सकता।” उनकी यह उक्ति शहर में भी गाँव देखने की अदम्य इच्छा जाहिर करती है जैसे गाँव उनके भीतर रचा बसा हो।
साहित्य से जुड़े कई वरिष्ठ प्रोफेसरों ने नामवर सिंह जी को साहित्य जगत में महत्वपूर्ण स्थान देते हुए अपने विचार प्रस्तुत किए –
डॉ. रतन कुमार पाण्डेय लिखते हैं, “डॉ. नामवर सिंह आत्मसजग वैज्ञानिक दृष्टि संपन्न आलोचक हैं। वे कुशल वैज्ञानिक की भाँति आलोचना के औजारों (मानदंडों) को परीक्षण की कसौटी पर कसकर परखते हैं। वे उस आँख को देखते हैं कि वह ठीक से देख रही है या नहीं।”
रोहिताश्व सर नामवर सिंह की आलोचना दृष्टि पर नजर डालते हुए कहते हैं, “नामवर सिंह आलोचनात्मक प्रतिमानों के रचाव में एक शातिर खिलाड़ी हैंl वे व्यावहारिक समीक्षा का उत्स भी रचते हैं और नव-आलोचकों के लिए पाथेय भी सहेजकर रखते हैं। वे कविता के नए प्रतिमान की विवेचना करते हुए केवल कुछ सिद्धांतों और प्रतिमानों तक सीमित रहना नहीं चाहते। वे श्योरी एवं प्रैविसस सिद्धान्त और व्यवहारगत समीक्षा के कायल रहे हैं।”
डॉ. केदारनाथ सिंह कहते हैं, “वे कहाँ रेखांकित करते हैं, किस शब्द पर रुकते हैं टिकते हैं, कविता में जाकर कहाँ उनकी दृष्टि पड़ती है ये अध्ययन का विषय है, जैसे मछली की आँख दिखाई पड़ती थी अर्जुन को। उस तरह नामवर जी कविता में मछली की आँख देखते हैं। वहाँ जाकर उनकी दृष्टि पड़ती है कविता या रचना जहाँ सबसे ज्यादा उसका धड़कता हुआ बिन्दु होता है नामवर जी की दृष्टि वहाँ पड़ती है।”
डॉ. शिवकुमार मिश्र उनकी समीक्षा शैली के बारे में लिखते हैं “उनकी समीक्षा प्रधानतः निबंधात्मक समीक्षा है। उनका रचनाकार और शैलीकार रूप अधिक भास्वर है, किन्तु उनके समीक्षात्मक निबंध भी ऐसे हैं जिनके संदर्भ में उनकी समीक्षा को रचनात्मक समीक्षा की संज्ञा देना कतई असंगत न होगा।”
डॉ. खगेंद्र ठाकुर के अनुसार, “लोग नामवर जी को मार्क्सवादी आलोचक कहते हैं, वे मार्क्सवादी हैं भी, लेकिन उनके आलोचना कर्म का आधार मार्क्सवाद नहीं है। वे तो बस आलोचक हैं, हिन्दी के आलोचक, साहित्य के आलोचक और उससे भी पहले जीवन और समाज के आलोचक।
डॉ. अर्जुन चव्हाण के अनुसार, “नामवर सिंह की आलोचना मूल्यों की हिमायत ही नहीं करती बल्कि हिन्दी आलोचना जगत में मानक की स्थापना करती है और प्रतिमान की भी। इसलिए वर्तमान अनेक रचनाकारों को यह शिकायत रहती है कि वे उनकी रचनाओं पर बात नहीं करते।”
डॉ. हूबनाथ पाण्डेय शब्द सुमन श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं –

बरगद एक विशाल वह,
बड़ा नामवर नाम।
शून्य छोड़ रसजगत में,
वरा शाश्वत विराम।।

शिखर पुरुष आलोचना,
परंपरा का दाय।
पंचतत्व में लीन हो,
मन ही मन मुसकाय।।

कर अनाथ वाणी जगत,
धारी अक्षर देह।
बूंद समानी समुद में,
काशी भई विदेह।।

धोती कुरता पान मुख,
होठों पर मुसकान।
उस जुलहे का शिष्य था,
ठोके ताल मसान।।

नहीं मरे वो नामवर,
मरता है संसार।
उसको तो मिल ही गया,
अनत जियावनहार।।
नामवर सिंह जी से साधारण बातचीत करना भी अपने विचारों को दिशा देना था। इस बात की पीड़ा मैं भीतर समोए हूँ कि उनसे कभी मिल नहीं पाई। आदरणीय साहित्यकार डॉ. नामवर सिंह जी को सादर नमन करते हुए उनकी एक सोच जो आज के परिवेश के लिए भी सटीक और अमूल्य है, कहना चाहूंगी –
“यदि आँख और पैर ऊपर वाले ने आगे देखने और बढ़ने के लिए दिए हैं तो हम पीछे क्यों देखे।”