लेख- डॉ. सुमीता ओझा / ‘रावलमुनिया का आलाप संसार

0
243

बिहार के बक्सर में जन्मी डॉ. सुमिता का डेरा-बसेरा फिलवक्त वाराणसी में है। गणित विषय से इन्होंने स्नातकोत्तर की शिक्षा प्राप्त की है। पीएच-डी. के लिए इन्होंने जिस विषय का चयन किया , वह अपने आप में अत्यंत ही नायाब है। इनके शोध का विषय था – ‘गणित व हिन्दुस्तानी संगीत के अन्तर्सम्बन्ध’ । इस विषय पर शोध के लिए एक ऐसे गाइड की जरूरत थी , जो गणितज्ञ के साथ संगीतज्ञ भी हो। अपने पिता के मित्र द्वारा सुझाये गए इस विषय पर कार्य करने के लिए इन्हें दीया लेकर गाइड की तलाश करनी पड़ी।  ‘स्टारडस्ट’  से जुड़कर फिल्म पत्रकारिता करते हुए इन्होंने विषय केंद्रित गाइड की तलाश जारी रखी। और अंततः इनकी जिद्द पूरी भी हुई। ‘स्टारडस्ट’ की एसोसिएट एडिटर रह चुकी सुमिता ने महज दो वर्ष तक सितार वादन का प्रशिक्षण लिया था। गणित संगीत और फिल्म पत्रकारिता के अलावे  इनका गहरा जुड़ाव साहित्य लेखन से भी है।  फिलवक्त स्वतन्त्र लेखन कर रही हैं। देश के कई प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं और ब्लॉगों के लिए निरंतर कविताएँ, आलेख और शोध-निबन्ध लिखते रहती है।  यहाँ प्रस्तुत  है  डॉ. सुमीता ओझा का लेख ‘रावलमुनिया का आलाप संसार ।

                                रावलमुनिया का आलाप संसार
                                     डॉ. सुमीता ओझा
एक समृद्ध संस्कृति की विविध रंगी छटा का उत्कृष्ट कोलाज है भोजपुरी प्रदेश. प्राकृतिक संसाधनों से भरा-पूरा. बहादुरी से लबरेज. मानवीय संवेदनाओं से संगीतबद्ध. फक्कड़ बौद्धिकता और मलंग मदमस्ती के ताने-बाने से बुना. किसी भी संस्कृति के अनेक आयाम होते हैं. जीवन से मृत्यु तक, आरम्भ से अन्त तक जिन सूक्ष्म विधानों से किसी समूह विशेष में मनुष्य गति करता है, वे विधान ही संस्कृति का वाहक बनते हैं. यहाँ तक कि खुश और उदास होने तक की भी एक शैली, एक भाषा विकसित होती जाती है. यही भाषा भोजपुरी के लोक-लुभावने रंगों में रंगकर चटख-मद्धिम रंगों का इन्द्रधनुष निर्मित करती है. यही भाषा भावों और छंदों में घुलकर एक ऐसे गेय संसार की रचना करती है जिसकी लय जीवन और मृत्यु के क्रमिक आवर्तनों में निबद्ध है. हास और विषाद का यह चिरन्तन आवर्तन ही भोजपुरी लोकगीतों का उजास है.
वाचिक परम्परा में सतत गतिमान लोकगीतों की महत्ता अपने समय के लिखित साहित्यिक दस्तावेजों से कतई कम नहीं होती. परिशोधित दस्तावेजी सेंसरशिप से सर्वथा मुक्त ये लोकगीत बोली-बानी की आंचलिकता से सुसज्जित जटिल मनोभावों के बृहत मनस-संसार का सुन्दर झरोखा होते हैं. अपनी सरलता से मन मोहते. ऐतिहासिक सच्चाइयों और साक्ष्यों के साथ. जीवन के ज्यादा निकट और विश्वसनीय. जहाँ अपनी बात कहने के लिए वाग्जाल के सहारे की कोई जरूरत नहीं होती. यही कारण है कि उन कवियों की रचनाएँ जो जटिल होते हुए भी सजीवता और जीवन से निकटता की प्रतीति कराती हैं, लोक में बहुतायत से प्रचलित है. जैसे संत कवियों कबीर, तुलसी, रैदास, मीरा आदि के पद. जहाँ तार, चरखा, पूनी, बुनाई है, जहाँ चन्दन और पाटी है, जहाँ राम-रमैया के बिना जीवन अधूरा है, जहाँ संतों के साथ बैठने से लोक-लाज खोने का भय है. आम जीवन की चित्र-विचित्र झाँकी ही वह कारण है कि भोजपुरी साहित्य की बात भिखारी ठाकुर के बगैर शुरू ही नहीं होती, जबकि भोजपुरी में लोकगीतों की परम्परा भिखारी ठाकुर की तुलना में बहुत प्राचीन है.
भोजपुरी लोक में अनेक किस्म के गीत प्रचलित हैं. इनमें सोलहों संस्कार गीत, होली, चैती, बारहमासा, रोपनी, सोहनी, कजरी, पीड़िया, छठ, आल्हा, बिरहा, निर्गुण आदि प्रमुख हैं. इन लोकगीतों में सबसे मुखर भाव/स्वर विरह है. यह विरह हर प्रकार के गीतों में उपस्थित है जबकि बिरहा लोकगीतों में एक विशेष प्रकार भी है. पिया के परदेश चले जाने के बाद उसकी याद और उदासी में घुलती स्त्री की व्यथा की मार्मिक अभिव्यक्ति दिल को छू लेती है. इन विरह गीतों में विरह वेदना के साथ विरहाकुल स्त्री की पारिवारिक-सामाजिक स्थिति और दूसरों द्वारा व्यवहार-परिवर्तन का दुःख भी ध्यानाकर्षित करता है. यह दुःख सास-ननद-गोतिन द्वारा व्यंग्यवाणों और गृहकार्यों, जिनमें कुटिया-पिसिया-जँतसारी और पानी भरना आदि शामिल है, का बोझ बढ़ने का है. यह दुःख पति की अनुपस्थिति में देवर, जेठ अथवा किसी राजा या कुँवर की उसके प्रति नीयत ख़राब हो जाने का है. यह दुःख भविष्य की आर्थिक सम्पन्नता के लिए पिया के परदेश पलायन कर जाने से उत्पन्न हुई गहरी विपन्नता का है. यह दुःख विषम परिस्थितियों में अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए संघर्षरत स्त्री का दुःख है. यह स्पष्ट होता है कि यह विरहिनी स्त्री मध्यम और निम्न वित्त-वर्ग का प्रतिनिधित्व करती है. कवि भिखारी का कहना है कि विरहिनी पत्नी का मन उम्र भर नजर भर कर अपने पति को देखते रहने की मिन्नतों में ही गुजरता है:
कहत भिखारी मनवा करेला हर घरिया हो नजरिया भरिया ना
देखत रहिती भर नजरिया हो उमिरिया भरिया ना …

भोजपुरी लोकगीतों में वर्णित परदेश के लिए जिन स्थानों का उल्लेख मिलता है उनमें कलकत्ता, बंगाल (वर्तमान बांग्ला देश) और ‘मोरंग देस’ (बर्मा में अवस्थित) प्रमुख है. वर्तमान में प्रचलित लोकगीतों का काल तय कर पाना तो मुश्किल है लेकिन इतना तो कहा ही जा सकता है कि भोजपुरी प्रदेश के लोग व्यवसाय या नौकरी करने इन स्थानों पर जाया करते थे. आज भी देश-विदेश के अनेक स्थानों पर भोजपुरी प्रदेश के लोग बड़ी संख्या में हैं. “भोजपुरी साहित्य का इतिहास” में उल्लिखित तथ्यों के अनुसार मुगलकालीन ऐतिहासिक प्रमाणों का साक्ष्य इन लोकगीतों में उपलब्ध है. इस आधार पर इनका इतिहास कम-से-कम पाँच सौ साल पुराना तो बैठता ही है. लेकिन सहज बुद्धि इन्हें मुगलकाल से भी काफी प्राचीन होना तय करती है. एक बात बार-बार दिमाग में दस्तक देती है कि इतने लम्बे समय से यहाँ के लोग किन सामाजिक-राजनैतिक परिस्थितियों के वशीभूत होकर प्राकृतिक सम्पदा से भरे-पूरे, हरियाली उपजाऊ भूमि छोड़कर दूसरे स्थानों पर पलायन करते रहे? यह सिलसिला आज भी जारी है. यह चिन्तन और शोध का विषय है.
इन गीतों का एक और पक्ष है जो विरहिनी स्त्री की व्यथा से कम मार्मिक नहीं है. वह है पूर्वी बंगालिन की हृदय-विदारक उपस्थिति. पूर्वी बंगालिन यानी बांग्ला देशी बाला. भोजपुरी लोकगीतों का पति जब परदेश प्रयाण करने वाला होता है तो उसकी पत्नी पूछती है कि वापस लौटते हुए वह उसके लिए क्या उपहार लाएगा. पति जवाब देता है:
तोहरा के ए धनी सोनवा से चनिया,
अपना के पुरुबी बंगालिन रावलमुनिया।
यानी अपनी धनी (पत्नी) के लिए ढेर सारा सोना-चाँदी और अपने लिए एक पूर्वी बंगालिन लाएगा. अर्थात् पूर्वी बंगालिन इतनी सस्ती और सर्वसुलभ है कि अन्य वस्तुओं की तरह उसे भी मोल लिया जा सकता है. यह तब के बंग प्रदेश (बांग्ला देश तब अस्तित्व में नहीं था) की सामाजिक-आर्थिक स्थिति का निरावरित, कारुणिक सत्य है. एक अजीब विरोधाभास है कि अपने घरों के विपन्न जन पैसे कमाने निकलते हैं और बंगभूमि के अत्यन्त गरीब और पिछड़े प्रदेशों तक जाकर लड़कियाँ (भी) मोल लाते हैं. लोकगीतों का यह प्रसंग पति द्वारा पत्नी को ईर्ष्या-दग्घ कर हल्के-फुल्के परिहास के क्षण जुटाने का विषय न होकर ऐतिहासिक सत्य है. यह सत्य है कि कभी कुछ दुधारू पशुओं, कभी कुछ रुपयों, कभी कुछ सेर अन्न के एवज में यहाँ लड़कियाँ बेच दी गई हैं. कभी-कभी तो मात्र यह सोचकर कि लड़कियाँ जिसके हाथों बेची जा रही हैं, वहाँ कम-से-कम पेट भर खाना तो नसीब होगा. लेकिन ऐसी बेच दी गई पूर्वी बंगालिनों का नसीब अपवादस्वरूप ही अच्छा हुआ होगा.
लोकगीतों का पति जब पूर्वी बंगालिन को लेकर गाँव वापस लौटता है तो गाँव के सीवान से घर के भीतर तक हर व्यक्ति से वह दुत्कारी जाती है. पति की ब्याहता स्त्री सौतियाडाह में झुलसती अपनी पड़ोसिन/गोतिन से सौतमिलन के उपाय जानती है और पहले ही परोसे गए खाने में विष डालकर पूर्वी बंगालिन को खिला देती है. पूर्वी बंगालिन विषादग्रस्त मृत्युगाथा छोड़कर परलोक सिधार जाती है. पीढ़ियाँ उनकी मर्सिया पढ़ रही हैं.
भोजपुरी का विरह गान अक्सर ही विदेसिया, परदेसिया, रावलमुनिया आदि को सम्बोधित कर लिखा और गाया जाता है. ये सम्बोधन गायन में टेक का काम भी करते हैं. सम्प्रेषण और अभिव्यक्ति इन सम्बोधनों के माध्यम से अधिक मार्मिकता और आत्मीयता ग्रहण करती है. भिखारी ठाकुर के विदेसिया का जगत प्रसिद्ध हो जाना अकारण अथवा संयोगवश ही नहीं हैं. यह दिल को चीर देनेवाली आह की अति मानवीय और मर्मान्तक अभिव्यक्ति है. रावलमुनिया वह ललमुनिया (छोटी लाल मादा पक्षी) है जो अन्तःपुर की विरहिनी स्त्री की एकान्तसंगिनी है. विछोह-वेदना से व्यथित नायिका अपनी आकुलता का साझा उसके सिवा और किससे करे? नायिका और उसकी रावलमुनिया दोनों की ही एक-सी अनुभूतियाँ हैं. दोनों प्रियहीना हैं, इसलिए एक-दूसरे की साझीदार भी हैं. यह रावलमुनिया सामाजिक व्यवस्था के तहत घर के भीतर ही रहने वाली उस अकेली स्त्री का भी प्रतीक है जो अपनी इयत्ता में वही गाने वाली छोटी लाल मादा पक्षी है जो गाती है और उड़कर अपने का प्रिय के पास पहुँच जाने के सपने सँजोती रहती है. रावलमुनिया आलाप संसार वस्तुतः यहाँ की स्त्री का मनस्-संसार है. स्त्री का यह मनस्-जगत कितना स्त्री द्वारा रचित है, कितना पुरुष द्वारा: यह भी जिज्ञासा और शोध का विषय हो सकता है. लेकिन जो भी हो, यह विश्वसनीय और प्रगाढ़ आत्मीयता से भरा-पूरा है.
यही विरह अपने चरम पर पहुँचकर शास्वत इयत्ता के प्रति आकुल पुकार और सघन तड़प में परिष्कृत होकर कभी प्रेमभाव में तो कभी ज्ञान भाव में अपनी अभिव्यक्ति करता है जो भोजपुरी लोक संस्कृति में निर्गुण की धीर गम्भीर धारा के रूप में सतत् प्रवाहमान है. यहाँ निर्गुणों की सशक्त और समृद्ध परम्परा कायम रही है. जगत प्रसिद्ध निर्गुण कवि संत कबीर का एक बहुत ही लोकप्रिय निर्गुण भोजपुरी भाषी स्त्रियों में प्रचलित है:
नइहरवा हमका न भावै…
साँई की नगरी परम अति सुन्दर
जहँ कोई जाए न आवै
चाँद, सूरज जहँ पवन न पानी
को सन्देश पहुँचावै …

कबीर के अलावा कितने ही अनाम अज्ञात कवियों के रचे निर्गुण भोजपुरी में गए जाते हैं. तथाकथित अनपढ़ समझे जाने वाले अवाम ने पीढ़ियों से अपनी स्मृति में, अपने गीतों में इन निर्गुणों को संरक्षित कर रखा है. यह संस्कृति कबीर, तुलसी, दादू, रैदास जैसे कवियों की वाणी पचाकर खड़ी हुई संस्कृति है इसीलिए तमाम असुविधाओं के बावजूद यह धरती मेधा और प्रतिभा उत्पन्न करने में अव्वल है. रोपनहारिनें और मजदूरिनें जब गाती हैं:
सोने के नइया, सुरति बोझवइया
रूपहि के लागे पतवार मोरे सजनी
आरे मोरे सजनी सामी भइले मो से बइरी
अंत न दे गइले ए राम…
(अर्थात सोने की नाव सी यह देह, जिसमें सूरत का बोझ और रूप की पतवार लगी है, जीवन की मँझधार में अटकी पड़ी है और मेरा स्वामी, ईश्वर, मुझसे वैरी हो गया है. मुझे अंत दिए बिना न जाने कहाँ चला गया है?)
या
जिन्हीं राम पिंजरा उरेहेले हो राम
कि आहो मोरे रामा पिंजरा रे भीतर मैना बोलेले हो राम…
(यानी जिस ईश्वर ने पिंजरा रूपी इस शरीर का निर्माण किया और इस पिंजरे में आत्मा या प्राण स्वरूप मैना बिठा दिया…)
तब तथाकथित शिक्षित लोग भी हतप्रभ रह जाते हैं. भाषा, भाव, ध्यान और ज्ञान के जिस शिखर पर ऐसे गीत रचे गए हैं वह हर्षविस्मित करता है. बेशक ऐसा हो सकता है कि समय की धूल रचनाकार का नाम ढँक
कभी-कभी कुछ टुटपुँजिए कवि भी अपनी पंक्ति में ‘कबीरा’ या ‘कहत कबीर’ जोड़कर लोककवि बनने का स्वाद लेते रहे हैं. जैसे:
गावेले कबीरदास इहे निरगुनवा हो राम
आहो रामा, जगवा में केहू नाहीं आपन हो राम.

निर्गुणों की पंक्तियाँ प्रायः ‘आहो रामा’, ‘आहो मोरे रामा’ जैसे सम्बोधनों से शुरू होती हैं ‘ए राम’ या ‘हो राम’ के टेक पर समाप्त. तात्पर्य यह निकलता है कि यूँ तो ये निर्गुण सर्वशक्तिमान, अरूप, अगोचर से सम्बोधित हैं, लेकिन लोकगीतों में यह सम्बोधन लोक के राम के नाम है. राम यानी सगुण ब्रह्म रूप, ईश्वर का अवतार. सहज ही प्रश्न उठ खड़ा होता है कि निर्गुणोपासना में राम का क्या काम? यह कैसा विरोधाभास है? या परस्पर विरोध के संतुलन बिन्दु पर ही निर्गुण का अस्तित्व है? या यह निर्गुण और सगुण ज्ञानोपासना के बीच सामंजस्य की कोई कोशिश है? या यह लापरवाही व अज्ञानवश प्रचलन में आया है? जो भी हो, ये निर्गुण ज्ञान की चरम, ठोस और बेलौस अभिव्यक्तियाँ हैं. जीवन के सत्य इनमें जिस सहजता और सजीवता में उपलब्ध हैं, वह अन्यत्र दुर्लभ है. सबसे ज्यादा ध्यान खींचता है इनका विम्ब-विधान और प्रतीक. जैसे:
ससुरा में पाँच गो भसुरवा, पचीस गो देवरवा बाड़े ए राम
तबहुँ ना ससुरा सोहावन, एकही बलमुआ बिना ए राम…

एक, पाँच और पच्चीस संख्याएँ क्रमशः एक परमात्मा, पंच तत्व (जिनसे इस जगत और मनुष्य सहित सभी प्राणियों की रचना हुई है) और पंचतत्वों के विभिन्न अनुपातों से निर्मित पच्चीस गुणधर्मों का द्योत्तक हैं. इस विषय की व्याख्या अध्यात्म-विज्ञान का क्षेत्र है. लेकिन इन जटिल रहस्यों को भी बेहद आसानी से इन संख्या प्रतीकों में ढालकर लोकचित्त में बसा देने में इन निर्गुणों की कोई सानी नहीं है. साधारण प्रतीकों में असाधारण कथ्य इनकी विशेषता है. ये प्रतीक भी लोकजीवन की ही तरह प्रदर्शनविहीन, जीवन्त और सरल है. खाँटी गवई भित्तिचित्रों की भाँति मनमोहक भी.
दूसरे प्रकार के गीतों की तुलना में निर्गुण और बिरहा अक्सर विलम्बित लय में और ऐसे धुनों में गाए जाते हैं जो करुण रस की सृष्टि करते हैं. यह गेय संसार भोजपुरी मानस की सदियों पुरानी परम्परा है जो आज भी अपने निजी स्वरूप में विद्यमान है.
सदियों की परम्परा मनुष्य की धमनी-शिराओं में प्रवाहित होने वाली वह अंतःसलिला बन जाती है जो सतत् ऊर्जा का स्रोत बन जाती है. जीवन का आदिम राग गुनगुनाते ये लोकगीत मनुष्य के अन्तःआकाश में एक विशिष्ट लोकरंग अक्षुण्ण रूप से जगमगाए रखते हैं जिनसे क्षेत्रविशेष का संस्कार निर्मित होता जाता है. यही विशेष संस्कार विश्वपट पर विशिष्ट पहचान के रूप में दर्ज होता है. भोजपुरी लोकगीत अपनी विशिष्टता के साथ विश्वपटल पर नाज के साथ शोभित हैं.

*****

Leave a Reply

Be the First to Comment!

  Subscribe  
Notify of