लेख – संजीव चन्दन / ‘रेणु के उपन्यासों में दलित स्त्री जीवन: स्त्रीवादी पाठ’

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बिहार के गया में जन्में संजीव चंदन चर्चित युवा संपादक हैं। स्त्री के सवालों को लेकर हर वक्त मुखर रहने वाले संजीव की छवि एक जुझारू युवा की है। ‘स्त्रीकाल’ त्रैमासिक पत्रिका और स्त्रीकाल का ऑनलाइन संपादकत्व का कार्य भार संभालने के कारण इनकी छवि महिला मुद्दे पर केंद्रित लेखक के रूप में है, लेकिन सच यह है कि इनके लेखन और चिन्तन का फलक हासिए के समाज तक फैला है। जन आन्दोलनों से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जुड़े रहने के लिए भी हर वक्त तत्पर रहते हैं। हम इनके लेख  ‘रेणु के उपन्यासों में दलित स्त्री जीवन: स्त्रीवादी पाठ’ का पुनर्प्रकाशन कर रहे हैं। इसका प्रकाशन हमने दो वर्ष पूर्व किया था लेकिन तकनीकी कारणों से यह आलेख रेणु को समर्पित वेबसाइट के अर्काइब में नहीं था। रेणु के शोधार्थियों के लिए आवश्यक इस पठनीय सामग्री को पुनः आप पाठकों के बीच प्रस्तुत कर रहा हूँ l… संपादक

                    रेणु के उपन्यासों में दलित स्त्री जीवन : स्त्रीवादी पाठ

                                         संजीव चन्दन
फणीश्वर नाथ रेणु के यहाँ दलित जीवन और दलित स्त्री जीवन की कथाएँ खूब हैं . यहाँ इस आलेख में रेणु के दो महत्वपूर्ण उपन्यासों ‘ मैला आंचल’ और परती : परिकथा में दलित स्त्री पात्रों के हवाले से उनके यहाँ अभिव्यक्त दलित स्त्री जीवन को समझने की कोशिश की गई है . यह देखने की कोशिश कि आजादी के एक दशक के भीतर प्रकाशित इन दोनो महत्वपूर्ण उपन्यासों ( क्रमशः १९५४ और १९५७ ) , जिसका कथा परिवेश आजादी के पहले के कुछ वर्षों से लेकर द्वितीय पञ्चवर्षीय योजनाओं तक फैला है , में दलित स्त्री जीवन का क्या यथार्थ का चित्रण भर है या उनका जीवन रेणु के ‘ दूसरा’ ( other ) होने की अवस्थिति से भी अभिव्यक्त होता है .

इन दोनो उपन्यासों में आजादी से प्रायः ‘निर्लिप्त’ और बाद में मोहभंग की स्थिति में जीते ग्रामीणों की कथा है , जो सरकारी योजनाओं के जमीनी हकीकतों से दो-चार हो रहे हैं .वहीँ उपन्यास का मुख्य स्वर आशावादी है, नए राष्ट्र की योजनाओं के प्रति आशान्वित राष्ट्रवादी आशावादिता . परती : परिकथा का नायक जीतेंद्रनाथ मिश्र ( जित्तन) १०४८ में शुरू हुए दामोदर वैली कोर्पोरेशन का काम देख आया है . वह ऐसी ही योजनायें अपने आस –पास के इलाके के लिए चाहता है , जो उस इलाके के बंजर भूमि को आबाद कर दे . द्वीतीय पञ्च वर्षीय योजना के आते –आते नायक का यह स्वप्न भी साकार होता दिखता है , वह अंततः अपने साथ ग्रामीणों को भी स्वप्न साकार होने के हर्ष में शामिल कर लेता है. वह ग्रामीणों को समझाता है कि इस परियोजना में ढाई हजार एकड़ उपजाऊ जमीन जा रही है, जबकि इसका लाभ ७ -८ हजार एकड़ जमीन को सिंचाई के रूप में मिलेगा . ( परती : परिकथा ३२८ ). वह विस्थापितों के पुनर्वास का तर्क भी देता है . दरअसल विस्थापन और पुनर्वास का पूरा खेल या तो तब तक यथार्थ रूप में रेणु के सामने नहीं था या फिर वे राष्ट्रवादी यज्ञ में इसे एक अनिवार्य आहुति मानकर चल रहे थे . दूसरे की सम्भावना इसलिए ज्यादा है कि रेणु एक सिद्धस्त समाजशास्त्री की तरह उपन्यास लिखते हैं , उनके यहाँ आगत भविष्य भी यथावत दर्ज हुआ है , वह तत्कालीन यथार्थ की नब्ज पकड़कर भविष्य का खाका खींच रहे थे . उनके सामने जमींदारी उन्मूलन से लेकर जमीन सेटलमेंट तक की तस्वीरें स्पष्ट थीं . तब भी लोकतंत्र के राष्ट्रवादी आयोजनों के प्रति आशा उनके यहाँ थी .

राष्ट्रवाद के आईने में दलित स्त्रियाँ

अब देखना है कि इस राष्ट्रवाद के भीतर दलित स्त्रियों का क्या स्थान है . चुकी ये दोनो उपन्यास रेणु की प्रतिनिधि रचनाएँ हैं , इसलिए इनके माध्यम से रेणु के यहाँ दलित स्त्रियों के जीवन , उनकी भूमिका और रेणु की यूटोपिया में उनका स्थान समझा जा सकता है . इन उपन्यासों में नारीवादी दृष्टि या दलित स्त्री जीवन पर चर्चा के पहले उपन्यासकार के पक्ष पर चर्चा उचित होगा। क्या वह एक स्पष्ट राजनीतिक पक्षधरता के साथ लिख रहा है ? क्या उसकी सहानुभूति किसी पात्र समूह के साथ है ? उसके सपने किसी पात्र में जाग्रत हैं ? क्या वह कहीं खड़ा दिखता है ? स्पष्ट राजनीतिक प्रतिबद्धता से लिखित साहित्य का प्रायः एक राजनीतिक दस्तावेज या नारा बन जाने का भी खतरा होता है, जो मैला आंचल में नहीं है, परती : परिकथा में हालांकि इसकी संभावना है .
रेणु की राजीनतिक पक्षधरता मैला आँचल में एक हद तक झलकती है। हां, कालीचरण जैसे पात्र उनके हाथ से निकल जरूर जाते हैं, जो विराट वामन बनकर उनसे अपनी मंजिल का पता पूछते हैं। दूसरा रेणु की अपनी वर्गीय चेतना गांव के सबसे बड़े शोषक तहसीलदार विश्वनाथ प्रसाद के साथ सहानुभूति बनाती है, जिसकी पड़ताल में भी जाया जा सकता है, परन्तु इस आलेख के लिए यह आवश्यक नहीं है। डा. प्रशांत और कमली के रूमानी प्रेम और प्रेम के आदर्श के साथ उपन्यास समाप्त होता है , जहां नीलोत्पल, अगली पीढ़ी पैदा होती है-1000 बीघे की अकूत सम्पदा का वारिस नवासा ! रेणु न कालीचरण की अगली पीढ़ी पैदा कर पाते हैं और न ही लक्ष्मी (बालदेव) या फुलिया की कोई औलाद। मैला आंचल का नायक कालीचरण हो सकता था, बल्कि होना चाहिए था परन्तु डा. प्रशान्त के माध्यम से रेणु का रूमानी आदर्श व्यक्त होता है। आखिर नीलोत्पल के जन्म के बाद तहसीलदार विश्वनाथ नाथ प्रसाद कुछ लोगों को पूरे सचेतन में जमीन का हक देते हैं- पांच दस बीघे का उपहार। सवाल यह है कि क्या लेखक विश्वनाथ प्रसाद या उनकी अगली पीढ़ी की सदाशयता पर शोषण से मुक्ति का स्वप्न रच रहा है ? क्या अपने हकों के लिए जो लोग बाद के बरसों में खूनी संघर्ष के रास्ते पर गये उनके संकेत रेणु को प्राप्त नहीं हुए थे या वे संथालों के संघर्ष का उचित समाधान बड़े किसानों की सदाशयता में ढूंढ़ रहे थे ?

परती : परिकथा का नायक जीतेंद्रनाथ मिश्र भी वैसे गाँव वालों को सर्वे सेटलमेंट में अपनी जमीनें जाने देता है , जो विरोध और विद्रोह की मुद्रा में नहीं हैं , कथावस्तु के अनुसार इस प्रक्रम में तिकडमी नहीं हैं . तिकड़मी, यानी विरोधी गाँव वालों को, एक इंच जमीन भी जाने नहीं देता , और अंततः पढ़े लिखे पिछड़े –दलित- द्विज ग्रामीण युवाओं के साथ मिलकर गाँव वालों को परती आबाद करने वाली परियोजना में शामिल कर लेता है , उन्हें इसके लिए भी तैयार कर लेता है कि इनकी जमीनें जायें तो जायें , इन्हें परियोजना में काम करने पर मजदूरी मिल रही है और शेष गाँव वालों की जमीनें आबाद हो रही है . इसके साथ ही वह स्थानीय संस्कृति और लोक उत्सव में पूरे गाँव वालों को शामिल कर लेता है . यह उपन्यास पढ़ते हुए १९५७ ( उपन्यास के प्रकाशन वर्ष ) में ही बनी मदर इण्डिया फिल्म की याद आती है , जो राष्ट्रनिर्माण के राष्ट्रवादी अभियान में ग्रामीणों को शामिल होने का आवाहन है . इन दोनो ही कलाकृतियों में द्वीतीय पञ्चवर्षीय योजना ( जिसका बड़ा लक्ष्य कृषि और कृषि सिंचन था ) के प्रति आस्थावान रचनाकारों की सफलतम अभिव्यक्तियाँ हैं , दोनो ही अपने –अपने रचना संसार में समादृत कृतियाँ हैं .इन बिन्दुओं पर बातचीत इसलिए आवश्यक है कि वर्णनात्मक उपन्यास होने के बावजूद ये बिन्दु ही मैला आंचल और परती : परिकथा में मूल स्थितियां बनाते हैं, तथा स्त्रीवादी या गैर स्त्रीवादी स्वरों की पड़ताल के लिए इन बिन्दुओं को केन्द्र में रखना जरूरी भी है।
हालांकि एक खास फर्क इन दोनो उपन्यासों में दलित स्त्री पात्रों की उपस्थिति में है . मैला आँचल की दलित स्त्रियाँ या तो यौनदासी हैं या उनकी अपनी यौनिकता को लेकर उनके अपने समाज और खुद लेखक के अपने आग्रह हैं . परती : परिकथा में कथा की नायिका दलित स्त्री है, वह शरतचन्द्र की नायिकाओं सी आदर्श स्त्री के रूप में है. इस उपन्यास में दलित लडकी पढ़ –लिखकर शिक्षिका बनकर अपने समाज में प्रगतिशील भूमिका में है . उपन्यास में अंतरजातीय विवाह भी संभव हो पाया है, जो मैला आँचल के कथा परिवेश में संभव नहीं दिखता है .

वर्चस्वशाली जातियां जिस प्रकार उत्पादन के तमाम संसाधनों पर अपना नियंत्रण रखती हैं, उसी प्रकार पुर्नउत्पादन के साधनों पर भी उनका नियन्त्रण रहता है, जो जाति-मूलक समाज में रक्त-शुद्ध नैरन्तर्य के लिए आवश्यक भी होता है। इस आलेख में हम आगे यह भी देखेंगे कि संस्कृतिकरण की प्रक्रिया में किस प्रकार जातियां अपनी महिलाओं पर नियन्त्रण का कार्य करती हैं। मेरीगंज के समाज का जो चरित्र हैं, वैसे चरित्र वाले समाज में नीची जातियों के श्रम, उसकी जजमानी और स्त्रियों पर सवर्ण जातियां अपना अधिकार समझती हैं। सहदेव मिसिर तन्त्रिमा टोली की फुलिया पर अपना जन्म सिद्ध अधिकार समझते हैं। इस टोली की औरतों का बाबू साहबों के घरों में काम करना भी निरापद नहीं है। यद्यपि मेरीगंज की नीची जाति के नौजावान इस सत्य को समझते भी हैं: ‘अरे हो बुड़बक बभना, अरे हो बुडबक बभना चुम्पा लेवे में जात नहीं रे जाए।’ (मैला आंचल पृ. 126) परन्तु कामरेड वासुदेव या कालीचरण की क्रान्ति योजनाओं में या उनकी पार्टी की प्राथमिकताओं में यह कोई विषय नहीं है, इसलिए इसकेा लेकर किसी आक्रोश या क्रान्ति की स्थिति नहीं बनती। जातीय अस्मिता को लेकर मेरीगंज को नीची जातियां अपना शिकंजा जरूरी अपनी महिलाओं पर कसती हैं। जातिगत विभेद, जो निम्न जातियों को उच्च जातियों के उत्पीड़न का शिकार बनाते हैं, महिलाओं पर पुरुषें के शिकंजा कसने की भूमिका निभाते हैं। जाति-मूलक समाज में पितृसत्ता इसी प्रकार पुनर्प्रेषित होती है तथा निरीह सामाजिक समूहों में अपने ही पुरुषों के आक्रमण से महिलाओं की निरीहता दुहरी होती जाती है। रामपिरिया जब नये महंथ की दासिन बनने जा रही है, तो जाति पंचायत उस पर नियन्त्रण करना चाहती है, यद्यपि ऐसा नहीं हो पाता है। तंत्रिमा टोली में भी पंचायत होती है कि तंत्रिमा टोली की कोई और बाबू टोला के किसी आंगन में काम करने नहीं जाएगी। तंत्रिमा टोली की तरह ही यह बन्दिश गहलोत क्षत्री, कुर्मी क्षत्री, पोलिया टोले, कुशवाह टोली में भी लगायी जाती है। रेणु जिस यथार्थ का चित्रण 50 के दशक में कर रहे हैं, वह यथार्थ धर्मवीर के औरत सम्बन्धी नियमों में भी प्रकट होता है। शिवनारनायण पंथ के विषय में समाजशास्त्री बर्नाड कोन का अध्ययन है कि इसमें शामिल चमारों और ठाकुरों के बीच एक समझौता हुआ कि ठाकुर ‘चमार-स्त्रियों’ पर अपना यौन-आग्रह छोड़ेंगे। सतनामियों ने किसान नेता बाबा रामचन्द्र को अपनी महिलाओं के लिए कोडिग हेतु बुलाया था। दरअसल, जातीय अस्मिता महिलाओं के माध्यम से ही प्रकट और निर्मित होती है।

मेरीगंज की दलित मलिाएं, आर्थिक, सामाजिक और यौन-मामलों में अधिक स्वतन्त्र हैं। फुलिया अपना सहवास सम्बन्ध सहदेव मिसिर, खलासीजी या पैटसन के साथ रखती है। बिना किसी कुण्ठा या अपराध-बोध के। नये महंथ की दासी बनने के लिए रामपिरिया पंचायत को अंगूठा दिखाती है। कांचा इलैया के अनुसार ‘दलित महिलाएं सवर्ण महिलाओं से अधिक स्वतन्त्र और गतिशील हैं। दलित महिलाएं पुनर्विवाह से लेकर यौन मामलों में स्वतन्त्र हैं और ऐसा श्रम प्रक्रिया में उनकी बृहदृतर भूमिका की अंतर्निहित गतिषीलता के कारण है।’ परन्तु उपन्यास में कई बार दलित महिलाओं के यौन-व्यवहारों को लेकर एक पूर्वग्रह-सा भी दिखता है, जो लेखक के इस समाज से बाहरी होने का संकेतक है। वह सवर्ण टोलों में प्रचलित गप्पों का शिकार-सा दिखता हैं हां, दलित महिलाओं की तुलना में सवर्ण महिलाओं की गुलामी जातिवादी -पितृसत्ता वाले समाज के अन्धविश्वासी और कुरूप चरित्र के अनुरूप है। ब्राह्मण ज्योतिषी अपनी पत्नी को सिर्फ इसलिए मरने देता हैं कि वह पर-पुरुष के सामने अर्द्धनग्न हो अपना आपरेशन नहीं करवा सकती। राजपूत स्त्री उपन्यास में तभी दिखाई या सुनाई पड़ती है जब हरगौरी की मृत्यु पर वह छाती पीटती है। फुलिया के यौन जीवन के विपरीत कमली का गर्भधारण पूरे परिवार के लिए कलंक बन जाता है, इज्जत पर खतरे पैदा करता है।
उत्तर भारतीय गांव के सामन्ती मूल्यों और यौन आग्रहों से जर्जर समाज की तरह मेरीगंज का समाज स्त्री उत्पीड़न की पराकाष्ठा पार कर जाता है। गांव के लोगों में मठ के प्रति आक्रोश तो है परन्तु श्रद्धा में भी कोई कमी नहीं है। दासिन लक्ष्मी को यौन-यातना देने वाला महंथ ग्रामवासियों की नजर में सद्गति को प्राप्त करता है। ‘रोज रात को लक्ष्मी रोती थी, ऐसा रोना कि जिसे सुन कर पत्थर भी पिघल जाए।’ इस क्रम में लेखक स्त्रियों के मानसिक अनुकूलन, जो धर्मसत्ता-पितृसत्ता करती है, को लक्ष्मी के पश्चाताप के माध्यम से व्यक्त करता है। यदि वह नहीं होती तो महंथ साहेब सतगुरु के रास्ते से नहीं डिगते। ‘यह ध्रु्रुव सत है। दोख तो लक्ष्मी का है। एक ब्रह्मचारी का धर्म भ्रष्ट करने का पाप उसके माथे है।’ धार्मिक और जातीय नियमन के प्रति सहज समर्पण पितृसत्तात्मक समाज में स्त्रियों की आम नियति है। कमली गर्भधारण के बाद निरन्तर ग्लानि की अवस्था में जीने को बाध्य है। पिता का विलाप उसकी इस बाध्यता के प्रेरक हैं। इधर लक्ष्मी के रुदन-क्रन्दन के बीच गांव में उत्सव, त्यौहार, गीत और नाच का आयोजन भी होता रहाता है। अशिक्षा और अन्धविश्वास की शिकार गणेश की नानी भी होती है, जिसे डायन होने के सन्देह पर मार दिया जाता है।

मेरीगंज की तरह भारतीय गांव में प्रायः स्त्रियों का श्रम शोषण, पुर्नउत्पादन- श्रम का दोहन होता है। अन्धविश्वास और दोहरी मार से स्त्रियाँ पीड़ित होती हैं, तथा जरूरी यौन चक्र (क्रूर भी) हर स्त्री की नियति है। बालदेव और कालीचरण भी स्त्रियों के प्रति कुण्ठा ओर श्रद्धा की दोहरी स्थिति में जीता है। स्त्रियों के प्रति कूढ़मगज समाज की आस्था बामन की आस्था की तरह होती है ,जो सोती स्त्री के अंग-प्रत्यंग को देखकर मायालोक में प्रवेश तो करता है परन्तु गांधीनुमा किसी भय के कारण उसका दमन करता है, यद्यपि वामन मैला आंचल का निर्मल और आदर्श पात्र है।

इन भयंकर यर्थाथों के चित्रण के अतिरिक्त मैला आँचल के उपन्यासकार ने कोई स्त्रीवादी स्थिति बनाई है या अपना कोई आदर्श रखा है, ऐसा नहीं कहा जा सकता। वह महिला उत्पीड़न या मुद्दों के प्रति चेतना सम्पन्न किसी कालीचरण को भी पैदा नहीं कर पाता है, जबकि कालीचरण महिलाओं को लेकर अपेक्षाकृत सम्यक व्यवहार करता है। उपन्यास की सभी महिला पात्र या तो काम विसंगति की शिकार हैं काम उत्पीड़न की। इससे बाहर न इनकी कोई एजेंसी है, न कोई सक्रियता या उनका होना पुरुष पात्रों के होने को सिद्ध करने के लिए होता है। लक्ष्मी की सक्रियता बालदेव के साथ घर बसाकर अच्छी गृह पत्नी बनने तक सीमित है। जबकि उपन्यास में धार्मिक संस्थानों से स्त्रियों को मिलने वाले आंशिक स्पेस का चित्रण तो है, निर्णयों के मामले में पहले महंथ की मृत्यु के बाद लक्ष्मी की एजेंसी दिखती हे, परन्तु वह स्पेस कोई निर्णायक परिणति तक नहीं पहुंच पाता।

परती : परिकथा में रेणु दलित स्त्रियों के भीतर से एक आदर्श नेतृत्व जरूर खड़ा करते हैं ; दलित जाति की लडकी ‘मलारी’ के रूप में . एक ख़ास हद तक परती : परिकथा भी चुकी यथार्थवादी रचना है , इसलिए उपन्यास में चित्रित दलित जीवन बिहार और खासकर उपन्यास के कथा –क्षेत्र ‘पूर्णिया अंचल’ के दलित जीवन की यथार्थ प्रस्तुति कहा जा सकता है . जब समकालीन महाराष्ट्र में डा बाबा साहब आम्बेडकर के प्रति आस्थावान दलित समाज उनके नेतृत्व में आमूल –चूल परिवर्तन के लिए संघर्षरत था, जब दलित युवाओं के बीच महात्मा गांधी के द्वारा उनके लिए दिए गए नाम ‘ हरिजन’ के प्रति जबरदस्त आक्रोश था, जब महाराष्ट्र में दलितों ने अपने ‘ नायक’ के नेतृत्व में धर्मपरिवर्तन का मन बना लिया था , जब दलितों और पूरे राष्ट्र के नेता ने ‘ हिन्दू कोड बिल’ न पारित करवाने की स्थिति में इस्तीफा दे दिया था, तब परती : परिकथा के कथाक्षेत्र से बड़ी मुश्किल से कोई दलित लडकी स्कूल की पढ़ाई पास कर शिक्षिका बनी थी . रेणु की यह दलित पात्र उस गाँव के उन कम पढ़े –लिखे लोगों में से एक है , जो जिले का सबसे उन्नत गाँव है , जहाँ की ७ -८ हजार आबादी के बीच ८ ग्रेजुएट , दो एम ए , एक शास्त्री ( काशी विद्यापीठ ), पचास मैट्रिक्युलेट, एक सौ मिडिल पास हैं , जिनमें कुछ लड़कियां भी मीडिल पास हुई हैं . मलारी को लेकर गाँव के गैर दलित लड़के फिकरेबाजी में लगे होते हैं . इन लड़कों के लिए ताजमनी ( कथानायिका , जो नट्टिन टोले की लडकी है ) और मलारी उनके आपस के हंसी –मजाक की पात्र हैं : स्कूल के एक रसिक किन्तु भुसकोल विद्यार्थी ने कहा, ‘ हर दूसरे दिन एक छोटा –सा लड़का हाथ में टिफिन –केरियर भरकर माल ले जाता है, नट्टिन टोले से हवेली की ओर . सेवा में , श्री जित्तन बाबू –तर माल ! हमारे हेड पंडितजी रोज उसके बारे में पूछते हैं , राह में देखकर. कल तो क्लास में ही दोहा –कवित्त जोड़ने लगे –‘प्रेम कटोरी रस –भरी , लखि रसना सरसाय…’…………………… ‘और मलारी ? दि हरिजन ग्लोरी.’’ ( परती : परिकथा , पृष्ठ ५७ )
अपने लिए सर्वथा इस विपरीत परिस्थिति में मलारी स्कूल जाती है, शिक्षिका बनती है , हालांकि इन्हीं प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण वह हाय स्कूल तक नहीं जा पाती है . उसके लिए प्रतिकूलता की स्थिति उसके अपने समाज में भी है , पिता कर्ज से घिरे हैं , उसका अपना जाति –समाज लडकी के बाहर जाने और पुरुष अधिकारियों से मिलने पर ऐतराज करता है , इसके बावजूद कोई ऐसा प्रतिरोध नहीं है कि वह पढ़ाना छोड़ दे , उसके भीतर आर्थिक आत्मनिर्भरता के कारण आत्मविश्वास भी है और वह अपने निर्णय मनवाने की स्थिति में है .

अपने समकालीन महाराष्ट्र की तुलना में देखें तो बिहार के इस कथा परिवेश में ‘हरिजन’ शब्द दलितों के लिए अपमानजनक नहीं हुए हैं . कमोबेश आज भी बिहार में संवैधानिक रूप से प्रतिबंधित हरिजन शब्द धडल्ले से इस्तेमाल होता है और इसके इस्तेमाल के लिए दलितों की बड़ी जनसंख्या आज भी अनुकूलित है . इस सब के बावजूद एक समानता है महाराष्ट्र की तत्कालीन दलित माताओं और मलारी की माँ में , वे शिक्षा के महत्व को बखूबी समझने लगी हैं, मलारी के लिए मलारी की माँ अपने हिसाब से अनुकूल स्थितियां बनाती रहती है . हालांकि महाराष्ट्र में दलित माताओं ने बाबा साहब डा आम्बेडकर के ‘शिक्षित बनो’ मन्त्र को पूरी तरह समझ लिया था और सामजिक तौर पर वे अपनी अगली पीढ़ी को किसी भी कीमत पर शिक्षित करने के बीड़े में शामिल हो गईं. मलारी और मलारी की माँ के आस -पास न तो ऐसी को सामजिक चेतना है और न डा बाबा साहब का कोई नेतृत्व . यह कथाक्षेत्र की हकीकत भी हो सकती है और कथाकार का अपना चुनाव भी. उनके उपन्यासों में गांधी , बिनोबा , जयप्रकाश , सबकी झलक मिलती है . नहीं मिलता है तो डा आंबेडकर का कोई जिक्र. परती : परिकथा में एक मंत्री की चर्चा है , जो शायद बाबू जगजीवन राम हैं ,जो अंतरजातीय विवाह को प्रोत्साहित करते हैं .

उपन्यास में मलारी और भूमिहार युवक सुवंश अन्तरजातीय विवाह करते हैं तथा खुशी –खुशी जीते भी हैं . मलारी को उसका परिवार शादी के वर्षों बाद आने पर स्वीकार कर लेता है , लेकिन सुवंश का परिवार इतनी उदारता नहीं दिखा पाता है . सुवंश और मलारी की भूमिका जीतेंद्रनाथ मिश्र के विकास कार्यक्रम और सांस्कृतिक आयोजनों मे काबिले गौर है , यह लेखक के राष्ट्रवादी संदेश की सुनिश्चित भूमिका भी है : पंचवर्षीय योजनाओं पर आधारित विकास , स्थानीय संस्कृति में रचा –बसा आपसी राग –द्वेश से मुक्त ग्रामीण समाज , जहाँ न कोई विरोध है न प्रतिरोध , और अंतरजातीय विवाहों , जैसे राज्य -प्रोत्साहित अभियानों में शामिल युवा – मानो अनतरजातीय विवाह थोड़े हलचलों के बाद समाज में स्वीकृत होने वाली परिघटनाएं हों.

परती : परिकथा की नायिका ताजमनी भी दलित है ( सरकारी तौर पर एन टी ). उसकी स्थिति रखैल की सी है , जबकि उसका व्यवहार नायक जीतेंद्रनाथ मिश्र को प्रेम करने वाली शरदचन्द्र की नायिकाओं सी . उसके समाज की महिलाएं शराब पीती हैं , गाँव के बाबू –बबुआनों का मन बहलाती हैं, जरूरत पड़ने पर यौन सेवाएं देती हैं . ताजमनी बचपन से ही जीतेंद्रनाथ मिश्र की हवेली पर रहकर अपने समाज से अलग जीवन जीती है , जीतेंद्रनाथ को समर्पित जीवन. परती : परिकथा की स्त्रियों की एक खासियत यह भी है कि गाँव के बाबू –बबुआन और पिछड़ी जाति के लोगों की महिलाएं एक ही जगह पानी भरती हुई पाई जाती हैं.उनकी लड़कियां दलित लड़कियों के साथ या उनकी प्रतिस्पर्धा में ‘ शामा –चकवा’ खेल खेलती हैं . महिलाओं के बीच इस आवाजाही से द्विज समुदाय संशकित रहता रहा है . बंगाल में ‘भद्र पुरुषों’ ने १९वी शताब्दी में ही अपने घरों में आने वाली मालिनों , धोबनों की आवाजाही पर रोक लगा दी थी क्योंकि उनके अनुसार ‘ भदेस’ महिलाएं उनकी स्त्रियों को पथभ्रष्ट कर रही थीं .मैला आँचल महिलाओं की इस आपसी आवाजाही का कोई प्रसंग भी नहीं है . मैला आँचल के दलित टोले में कोई मलारी भी नहीं है . वहां फुलिया है , जो स्वच्छंद यौन व्यवहार करती है . ऐसा भी नहीं है कि मलारी के गाँव में दलित स्त्रियों के ऊपर गैरदलित मर्दों के यौन –दावे या लम्पटता नहीं हैं . उपन्यास में विदूषक की सी स्थिति वाला पात्र ‘दिवाना’ तो घोषित तौर पर उससे प्रेम प्रकट करता है, जो उनलोगों से निश्च्छल प्रेम है , जो मलारी को अपनी वासनाओं का शिकार बनाना चाहते हैं . मलारी इस स्थिति को समझती भी है , वह जानती हैं कि उसका पिता चिडचिड़ा क्यों हो गया है . ‘ मलारी का बाप ही क्यों किसी भी लडकी का भी बाप ऐसा ही मद्द्की और चिडचिडा हो जाएगा , हमेशा आदमी को हांकते –हांकते ….पिछली चार –पांच रात से चौबे जी पर भूत सवार हुआ है.’ (परती : परिकथा , पृष्ठ १६०-१६१ ) मलारी के प्रति यौन –आग्रह रखने वाला गैर दलित समाज उसके शिक्षिका होने को भी बर्दाश्त नहीं करता . वह अपनी बेटियों के स्कूल जाने पर ताने कसने लगा है जबसे ‘ रैदास की बेटी’ स्कूल में मास्टरनी हुई है.

‘दूसरी दृष्टि , लेखकीय संवेदना , राष्ट्रवाद और दलित स्त्री जीवन

परती : परिकथा में स्त्रियाँ जब भी आपस में मिलती हैं तो एक दूसरे की शिकायत करती हुई , या एक दूसरे से लडती –झगडती हुए या तीसरी को लानतें –मलानातें भेजती हुई . ऐसे प्रसंगों में पिछड़ी जाति की महिलाओं को ज्यादा झगडालू बताया गया है . दलित स्त्रियों का वर्णन ही इस लड़ाई –झगड़े से शुरू होता , जिनकी लड़ाइयों से उनके मर्द निर्लिप्त होते हैं , क्योंकि उन्हें लगता है कि वे लड़ते –लड़ते जल्द ही बहनापा भी कर लेती हैं . उपन्यास में यथार्थ और रचनकार के दूसरा ( other ) होने के कारण बने पूर्वग्रहों का ख़ासा घालमेल है, जो मैला आँचल में सपष्ट दिखता है .
मैला आँचल की तुलना में परती: परिकथा में उपन्यास दलित स्त्रियों के प्रति ज्यादा उदार दिखता है , वह राष्ट्रवादी एजेंडे के अनुरूप यहाँ एक दलित नायिका ( सह ) की कहानी कहता है. एक खासियत यह भी है कि उपन्यास की नायिका भी यहाँ दलित है : ताजमनी. उसकी एक समानता मैला आँचल की नायिका से है , उसकी उपस्थिति भी नायक के सापेक्ष ही है . मैला आँचल की कमला शरतचन्द्र के उपन्यासों की नायिका की तरह प्रेम करने के लिए ही पैदा हुई है या उसकी सार्थकता कुमार नीलोत्पल को जन्म देने भर में है:
‘वेदान्त……..भौतिकवाद…………मानवतावाद।……….. हिंसा से जर्जर प्रकृति रो रही है।……..नीलोत्पल। नहीं-नहीं। यह अंधेरा नहीं रहेगा। मानवता के पुजारियों की सम्मिलित वाणी गूंजती है…. पवित्र वाणी। उन्हें प्रकाष मिल गया है।’ (मैला आंचल पृ. 311)

मैला आंचल में ममता श्रीवास्तव त्याग और आदर्श की प्रतिमूर्ति है, जिसका जन्म या उपस्थिति डा. प्रशांत को प्रेरणा देने भर के लिए है, चरखा सेण्टर की मास्टरनी कालीचरण की प्रेरक शक्ति है और बालदेवजी को लक्ष्मी में भारतमाता का दिग्दर्शन होता है-राष्ट्रवाद नातेदारियों में व्यक्त हो रहा है। जाति और राष्ट्र महिलाओं में रूपाकार होते हैं और महिलाएं जाति -गर्व या राष्ट्रवाद की अभिव्यक्ति का माध्यम भी बनती हें। एक तरफ तो आक्रान्ता समूह या वर्चस्वशाली समूह द्वारा पराजित जातियों की महिलाओं पर नियन्त्रण, आक्रमण से स्वयं को शक्तिशाली सिद्ध करते हैं वही उत्पीड़ित समूह महिलाओं पर किसी भी प्रकार के शाब्दिक, आंगिक आक्रमण से उद्वेलित होता है। इसके अलावा जाति अथवा राष्ट्र के प्रति भक्ति निवेदन स्त्री के माध्यम से सगुण रूप में साकार होता है। राष्ट्र ‘प्रेमिका’ अथवा ‘माता’ के रूप में सगुण रूप ग्रहण करता है। बालदेव लक्ष्मी में और माये जी (रामकिसून बाबू की पत्नी) में एक सहज सम्बन्ध खींचते हैं, जो खिंचकर भारतमाता से भी जुड़ता है। माये जी का दुःख देखकर बालदेव को भारतमाता रोती नजर आती हैं- ‘गंगा रे जमुनवां की धार नयनवों से नीर वही। फूटल भरथिया के भाग भारत माता रोई रही ‘( मैला आँचल ,पृष्ठ. 48) कालीचरण का समाज भी चरखा, मास्टरनी में अभिव्यक्त होता है और समाज सेवा की अभिव्यक्ति मास्टरनी की सेवा से होती है। स्त्री के राष्ट्र होने का एक चित्र रेणु बालदेव के सपने में खींचते हैं, जहां लक्ष्मी भारतमाता की सगुण देह है और हरगौरी आक्रान्ता अंग्रेज। सोश्लिष्ट चिनगारी जी को लक्ष्मी द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद की सीनथिसिस दिखाई देती है। पुरुष के स्वयं का राष्ट्र नियामक या रक्षक की भूमिका में महसूस करने की प्रेरणा भूमि इसी दर्शन से बनती है।
इस प्रकार ये उपन्यास किसी भी स्पष्ट स्त्रीवादी दृष्टि से रहति उपन्यास हैं । लेखक सुलभ संवेदनशीलता भले ही रेणु का तादात्मय स्त्रियों के प्रतिसंसार के साथ स्थापित करती है। मातृत्व और राष्ट्रवाद का चित्रण मानव सन्तति की उज्ज्वल निरन्तरता और स्त्री-पुरुष स्नेह से अधिक रेणु का कोई यात्रा लक्ष्य स्त्रियों के सन्दर्भ में इन उपन्यास में नहीं दिखता। हाँ, चित्रण के स्तर पर दुःस्थितियों के चित्रण में वे सफल हैं। उनकी सभी स्त्री पात्र एक नियत भूमिका में होती हैं। दलित स्त्री पात्रों के साथ तो वे लेखकीय संवेदनशीलता और ‘दूसरे की अवस्थिति’ के दोहरे पायदान पर खड़े होते हैं . वे १९५७ में , धम्मचक्र प्रवर्तन के एक साल बाद तक भी डा आम्बेडकर की उपस्थिति से या तो अनजान हैं , या उन्हें अपने एजेंडे में शामिल नहीं देखते हैं ,या वे अपने कथा क्षेत्र के यथार्थ प्रति ज्यादा सचेत हैं कुछ भी हो , उपन्यासकार के राष्ट्रवादी एजेंडे में पढ़ा –लिखा दलित समाज है , जिसके युवा राष्ट्रवाद के मार्ग में जातिवाद के विकल्प के लिए अंतरजातीय विवाह जैसे क्रांतिकारी पहल कर रहे हैं . अपनी दलित पात्र ‘मलारी’ में वे बिहार की दलित स्त्रियों की पहली पढ़ी –लिखी पीढ़ी को जरूर अपना विषय बनाते हैं , इसका श्रेय उन्हें जाना चाहिए, क्योंकि तब तक बिहारी दलितों के बीच पुरुषों के पढने –लिखने का चलन आम नहीं हुआ था . तब तक बिहार की पहले दलित राजनेता की बेटी भी दलित स्त्रियों के लिए प्रेरणा बन पाने की उम्र से बहुत छोटी थी , १२ साल की . मिडिल स्कूल में दाखिल ही हुई होगी, जिसे रेणु की दलित स्त्री पात्र मलारी ने पास कर लिया था .