लेख – सुजाता / नोआखाली में गाँधी                      

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लेखिका सुजाता चौधरी उर्फ़ सुजाता स्वतंत्र लेखन से जुड़ी हैं| लेखन के साथ-साथ समाजसेवा से भी इनका गहरा जुड़ाव है| ट्रस्ट के माध्यम से बालिका शिक्षा और महिला स्वावलंबन के लिए बिहार के भागलपुर में कार्य कर रहीं हैं | साथ ही साथ वृंदावन में भी आश्रम का संचालन कर रहीं हैं| राजनीति शास्त्र और इतिहास में स्नातकोत्तर के साथ- साथ वकालत की भी पढाई पूरी कर चुकी सुजाता कथा और कथेतर साहित्य विधा में लेखन करती हैं| दुख भरे सुख, कश्मीर का दर्द , दुख ही जीवन की कथा रही, प्रेम पुरुष, सौ साल पहले, चम्पारण का गाँधी, सरीखे उपन्यासों एवं मर्द ऐसे ही होते हैं, सच होते सपने , चालू लड़की कहानी संग्रह का प्रकाशन हो चुका है| महात्मा गाँधी के साहित्य को लेकर भी इन्होंने सराहनीय सृजनात्मक कार्य किया है| गाँधी पर केन्द्रित लगभग आधा दर्जन पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं| यहाँ प्रस्तुत है सुजाता द्वारा लिखित लेख ‘नोआखाली में गाँधी|’ – संपादक . . . 

                  नोआखाली में गाँधी
                       सुजाता
बहुत सारी घटनाएँ इतिहास के पन्नों में दर्ज होती हैं,जिनमें कुछ लुप्त हो जाती है और कुछ वर्तमान परिप्रेक्ष्य में भी उतनी ही प्रासंगिक होती हैं| नोआखाली की घटना इतिहास के चेहरे पर कभी नहीं मिटने वाला एक बदनुमा दाग है और गाँधी का नोआखाली प्रवास एक कालजयी गाथा|नफरत की आंधी में मनुष्य मनुष्य नहीं रहकर सिर्फ जातिय संप्रदाय का एक हिस्सा,उन्मादी भीड़ का एक पुर्जा ,पीड़क अथवा पीड़ित औरत या मर्द रह जाता है|
मुस्लिम लीग की सीधी कार्यवाही जब कोलकाता में सफल नहीं हो पाई तो शस्य श्यामला नोआखाली पर उनका ध्यान गया | बहुसंख्यक मुस्लिम के सामने अल्पसंख्यक हिंदुओं की संख्या नगण्य थी| पाकिस्तान प्राप्त करने के लिए नफरत, हिंसा , धर्मांतरण और बलात्कार जैसी घटनाओं के द्वारा अल्पसंख्यकों पर कहर ढाकर यह सिद्ध करने की कोशिश की जा रही थी कि हिंदू मुस्लिम एक साथ नहीं रह सकते, और इस काम को अंजाम देने के लिए नोआखाली का ही चयन किया गया था |
अंग्रेजी हुकूमत इस दंगे को हवा देने में अपनी विशिष्ट भूमिका निभा रही थी | उसे अब भी उम्मीद थी कि वह दुनिया के सामने साबित कर देगा,इस देश के नागरिक स्वतंत्र रहने की योग्यता नहीं रखते |अंग्रेजी हुकूमत अपनी चहेती मुस्लिम लीग की पीठ थपथपा रही थी| कुछ कट्टरवादी हिंदू ताकतें भी अंग्रेजी हुकूमत से पोषित होकर अलगाववाद का समर्थन कर रही थी |
1946 में बंगाल में मुस्लिम लीग सत्तासीन थी, और जब सत्ता ही दंगे की प्रायोजक हो तो उसकी चरमावस्था का सहज अनुमान लगाया जा सकता है| 10 अक्टूबर 1946 को नरक पाशविक लीला का तांडव नृत्य प्रारंभ हुआ| एक सप्ताह तक बाहर की दुनिया को इसका कुछ भी पता नहीं चला| नोआखाली के सर्वनाश और निराशा की घड़ी में अंधकार के सिवा कुछ दिखाई नहीं पड़ रहा था|
नोआखाली से बहुत दूर दिल्ली की भंगी बस्ती के एक छोटे से कमरे में महात्मा गांधी सेवाग्राम जाने की तैयारी कर रहे थे, उसी समय नोआखाली का हृदय विदारक समाचार उन्हें ज्ञात हुआ| उन्होंने फैसला कर लिया- अब सेवाग्राम नहीं,नोआखाली जाना है |
चर्चित अमेरिकी पत्रकार प्रेस्टन ने उनके फैसले पर सवाल किया – क्या मुस्लिम लीग के होते हुए मुसलमान आपकी बात सुनेंगे?
गांधीजी का उत्तर था – मुझे पता नहीं परंतु मुझे आशा रखने का अधिकार है| जो आदमी अपने कर्तव्य करने के लिए जाता है वह केवल यही आशा रख सकता है कि ईश्वर उसे कर्तव्यपालन की शक्ति देगा|
उसी ईश्वर को, अपने अंतस में बसने वाले राम के साथ अट्टहतर साल के वयोवृद्ध गाँधी हाथ में एक अहिंसक लाठी लेकर कूच कर गए ,उत्तर पश्चिम से सीधे पूरब |उस स्थान के लिए जहां दावानल धधक रहा था| जहां पहले वे कभी नहीं गये थे; जहां की न भौगोलिक जानकारी थी, न भाषा की| उन्हें चेतावनी दी जा रही थी, उनकी गाड़ी में खिड़कियों से तेजाब फेंकी जा सकती है| गांधी जी के मित्रों की दृष्टि में ऐसा खतरा उठाना उचित नहीं था पर गांधीजी नहीं माने- जब तक मैं वहां नहीं जाऊंगा, मुझे आंतरिक शांति नहीं मिलेगी| अब किसी के पास रोकने के लिए शब्द नहीं थे|
दिल्ली से कोलकाता के रास्ते में पड़ने वाला एक भी ऐसा स्टेशन नहीं था जहाँ विशाल जन समुदाय अपने महात्मा की एक झलक पाने के लिए लालायित नहीं था|
कोलकाता में किसी ने उन से पूछा– आप यहां क्यों आए हैं? गांधी ने सहजता से उत्तर दिया- मैं बंगाल किसी का न्यायधीश बन कर नहीं जा रहा हूं| मैं वहां ईश्वर का सेवक बनकर जा रहा हूं,जो ईश्वर का सच्चा सेवक है उसे सारी सृष्टि का सेवक बनना पड़ता है |
लीगी समर्थक एक मौलवी ने आरोप लगाते हुए कहा- मुंबई, अहमदाबाद और छपरा छोड़कर नोआखाली इसी से आए हैं न, क्योंकि पीड़ित हिंदू हैं ?
गांधी का उत्तर था- आपके बताए हुए स्थान पर अवश्य जाता , यदि वहां भी नोआखाली जैसी भीषण घटनाएं हुई होती| अत्याचार और बलात्कार की शिकार बनी हुई नोआखाली की नारियां मुझे बुला रही हैं |आवश्यक हुआ तो मैं नोआखाली में मर जाऊंगा पर हार नहीं मानूंगा और गांधी ने हार नहीं मानी|
अपना पूरा जीवन कसौटियों पर कसने वाले गांधी ने जीवन के हर लम्हें को एक वैज्ञानिक की तरह जीया था| नोआखाली को उन्होंने अपनी प्रयोगशाला बनाकर प्रयोग करना प्रारंभ कर दिया |प्रयोग का पहला सूत्र था—निर्भीकता| बिना एक पल गंवाए गांधी अनुसंधान में जुट गए |मुस्लिम हो या हिंदू एक एक से संवाद स्थापित करने लगे– आखिर हुआ क्या था?
जैसा हमेशा होता है बलशाली कमजोर को ही दोषी बनाता है |शेर और बकरी की कहानी हर स्थान पर फिट बैठती है |मुस्लिम लीगियों ने रोष में भरकर बताया यहाँ कोई दंगा नहीं हुआ है| शरणार्थियों को घर छोड़कर शरणार्थी कैम्प जाने की वजह झूठे अखबारी प्रचार हैं| एक लीगी विधायक ने यहां तक कहा—हिंदुओं द्वारा लीग सरकार को बदनाम करने के लिए यह सब किया जा रहा है|
गांधी ने तीखे स्वर में पूछा था — इसका मतलब हिंदू ही दंगों के अपराधी हैं ?इस पर कोई विश्वास नहीं कर सकता |लोग अपने घरों से क्यों भागे ?लीगियों को बदनाम करने के लिए कोई अपना सर्वस्व लुटा देगा ?
गांधी समझ गए कमजोर निरपराधियों को दोषी बनाया जा रहा है, ठीक उसी तरह जैसे चंपारण में निलहे साहब गरीब किसानों को बना देते थे| गांधी ने कट्टर नेताओं को समझाते हुए कहा -मेरे हृदय में इस्लाम के पैगंबर का आदर आप से कम नहीं है, परंतु तानाशाही और बलात्कार किसी धर्म को भ्रष्ट करने का मार्ग है न कि उसे आगे बढ़ाने का |
हिंदू अल्पसंख्यकों के भय की कोई सीमा नहीं थी |गांधी उनके अंदर निर्भीकता भरने का यत्न कर रहे थे — आप अपने अंदर के भय को निकाल दें| खतरे का सामना करने की बजाय उससे भागना मनुष्य में, ईश्वर में और अपने आप में भी श्रद्धा का अभाव सूचित करता है|
गांधी जब चौमुहानी (नोआखाली) पहुंचे, चारों तरफ विनाश का तांडव था| गली, घर, चौराहे से सड़ांध बदबू आ रही थी | गांधी और उनके सहयोगियों ने घरों की मरम्मत, गलियों की सफाई से लेकर टूटी सड़कों के निर्माण का जैसे जिम्मा ले लिया| पुनर्वास के लिए गृह निर्माण आदि कार्यों में लोगों को श्रमदान करने के लिए स्थानीय लोगों को राजी किया | मुस्लिमों द्वारा उनके घरों की मरम्मत, साफ सफाई करने में श्रमदान करते देख अल्पसंख्यको हिंदुओं का विश्वास लौटने लगा|सिर्फ घरों की मरम्मत नहीं हो रही थी दिलों की रफ्फुगिरी करने की कोशिश भी की जा रही थी|पाँच हजार जनसंख्या वाले स्थान चौमुहानी में पन्द्रह हजार से अधिक लोगों ने गांधीजी के सायंकाल की प्रार्थना में शिरकत किया ,जिनमें अस्सी प्रतिशत मुस्लिम थे| प्रार्थनासभा में रामधुन गाने के बाद गांधी ने कहा — मैं क्रोध से नहीं, दुख से बात कर रहा हूं ,जब से बंगाल आया हूं मुस्लिम अत्याचार की भयानक कहानियां सुन रहा हूं| इस्लाम शब्द का अर्थ ही अमन और शांति है, इसमें इन बातों की इजाजत नहीं है|
नोआखाली में गांधी अर्द्धउपवास कर रहे थे |वे छह सौ कैलोरी से भी कम पोषण ले रहे थे- ढाई सौ ग्राम बकरी का दूध और ढाई सौ ग्राम उबली सब्जी का रस| महात्मा गांधी के लिए नोआखाली एक यज्ञ स्थली थी तभी तो उन्होंने अपने पैरों से चप्पल तक उतार दिया| उनका मानना था जिस स्थान पर निर्दोष लोगों ने इतने कष्ट सहे. उनका कष्ट तपस्या बन गया है और उस तपस्या से यह भूमि इतनी पवित्र बन गई है कि चप्पल पहनकर चलना उन्हें स्वीकार्य नहीं था| नंगे पांव चलने से उनके पैरों में घाव हो गए थे , घाव की पीड़ा शायद उनके पीड़ित मन को संतोष देती होगी|
महात्मा गांधी ने कठोरतम सत्य लोगों से कहा, कुछ छिपा कर नहीं रखा, कोई चीज दबाई नहीं, किसी बात में लल्लो चप्पो नहीं की, फिर भी उनकी वाणी से किसी को आघात नहीं पहुंचा|
नोआखाली के गांवों में जो हिंदू स्त्रियां उपद्रव के दिनों में मुसलमान बना ली गई थी, उन सभी को गाँधी के प्रयास से वापस अपने मूल धर्म में लाया गया| गांधी जी के सामने उन सबने ताल के साथ सुर मिलाकर रामधुन गाया| महात्मा गांधी के शांतिमिशन के प्रभाव से थोड़े ही अरसे में समस्त नोआखाली जिले में जबरदस्ती मुसलमान बना हुआ कोई व्यक्ति ऐसा नहीं रहा जो अपने मूल धर्म में वापस न आ गया हो| गांधी सामूहिक रूप से धर्मांतरण को स्वीकार नहीं करते थे,उनकी सोच थी- अपनी जान माल को बचाने या सांसारिक लाभपाने के लिए धर्मांतरण हरगिज़ नहीं किया जा सकता| नोआखाली में जो कुछ हुआ उसका केवल इस्लाम में ही क्यों ,सभी धर्मों में निषेध है| नोआखाली के अनेकानेक मुल्लाओं ने भी इस बात का समर्थन किया कि भयभीत करके इस्लाम स्वीकार कराने से इस्लाम का अपमान होता है| इस्लाम श्रद्धा सहित धर्म ग्रहण करने की इजाजत देता है|
महात्मा गांधी एवं उनके सहयोगियों की उपस्थिति में अल्पसंख्यकों का आत्मबल लौट रहा था, किंतु वे अकेले में घबराते थे |महात्मा गांधी ने नोआखाली के लोगों के सबसे बड़े शत्रु को पहचान लिया था,और वह शत्रु था—भय| डरने वाले और डराने वाले दोनों ही इसके शिकार थे इस भय को समाप्त करने के लिए गांधीजी ने एक अलौकिक निर्णय लिया| अभी तक वे और उनके सहयोगी एक साथ किसी छावनी में रहकर लोगों के बीच काम कर रहे थे |गांधी ने कहा– मैं लोगों से कहता हूं अकेले रहो पर डरो मत और स्वयं इतने लोगों से घिरा रहता हूं,यह सही नहीं है| महात्मा गांधी ने अपने तमाम साथियों को एक-एक पीड़ित गाँव में भेज दिया कि हम सब अल्पसंख्यकों की सुरक्षा में जामिन बन जाएँ| महात्मा गांधी स्वयं भी वैष्णव जन….. की प्रार्थना के बाद अकेले एक छोटी सी नाव पर सवार होकर अंधकारपूर्ण अज्ञात का सामना करने के लिए चल दिए |
महात्मा गांधी ने नोआखाली के सैंतालिस पीड़ित गांवों का न सिर्फ भ्रमण किया बल्कि वहां रहकर समस्याओं का अंत करने के लिए अपने आपको पूरी तरह झोंक दिया| महात्मा गांधी नोआखाली में सोलह घंटे तक कठिन मेहनत कर रहे थे| वे रात्रि के ग्यारह बजे सोते थे और तीसरे प्रहर दो बजे ही उठ जाते थे|वे वहाँ चिकित्सक के दायित्व का भी निर्वहन कर रहे थे और साथ ही एक परीक्षार्थी की तरह बांग्ला भाषा भी सीख रहे थे|वहीं दूसरी ओर विद्यालय की स्थापना कर रहे थे|
धीरे-धीरे गांधीजी का खमीर काम करने लगा |श्रीरामपुर में छह सप्ताह रहते-रहते उन्होंने अधिकांश लोगों का दिल जीत लिया|जब भी वे बाहर निकलते सभी जगहों पर फलों की भेंट लिए मुस्लिमों की भीड़ खड़ी होने लगी| अब सब लोग यह जान गए थे कि गांधीजी हम में से एक हैं| उनके साथ मानवता का ऐसा नाता है जो जाति और धर्म के सारे भेदों से परे हैं|
हिंदुओं में भी गांधी जी के प्रेम के संदेश के कारण नूतन उर्जा का संचार होने लगा| 4 दिसम्बर को छह सौ हिंदू नर-नारियों और बालकों का एक जुलूस छह मील दूर गांव से खोल करताल के साथ संकीर्तन करते हुए गांधीजी के पास जब पहुंचा तो सभी विह्वल, आनंदमग्न और आत्मसंतोष से सराबोर हो रहे थे |
भगाई हुई अथवा जबरदस्ती मुसलमान बनाई हुई स्त्रियां और लड़कियों के बारे में महात्मा गांधी के मजबूत रवैये का वांछित परिणाम यह हुआ कि पीड़ित लड़कियों को बिना किसी कठिनाई के सामान्यतः अपने परिवारों में वापस ले लिया गया| देश भर से ऐसे नौजवानों के बहुत से प्रस्ताव आए जो सारे पूर्वाग्रहों को छोड़कर औरों की अपेक्षा ऐसी लड़कियों के साथ विवाह करने को तैयार थे |
गाँधी के हृदय की पीड़ा सिर्फ नोआखाली के हिंदुओं के लिए नहीं थी| उनका मन बिहार के पीड़ित मुसलमानों के लिए भी उतना ही तड़प रहा था|नोआखाली में चार महीने रहने के बाद उन्हें बिहार के पीड़ितों के पास आना पड़ा|
गाँधी की सोच थी — बिहार के हिंदुओं के कुकृत्य को इसके लिए माफ नहीं किया जा सकता कि दंगे की शुरुआत मुसलमानों ने की है |उन्हें विश्वास था ,बदले की भावना एक दिन सब कुछ जला कर खत्म कर देगी|
गांधी ने कहा था -प्रतिशोध न तो शांति का मार्ग है और न मानवता का, अगर आप थप्पड़ मारने वाले को क्षमा नहीं कर सकते तो वहां जाकर कुकृत्य करने वाले दंगाइयों से बदला लीजिये जिसने अपराध किया है|अपराधी के बदले में किसी को मार देना मानव गौरव को कलंकित करना है, इतना याद रखिएगा खून के बदले खून का नारा देना जंगलीपन है|
उस समय कट्टर मुस्लिम महात्मा गाँधी पर हिन्दुओं को बचाने का आरोप लगा रहे थे तो दूसरी ओर कट्टर हिन्दुओं द्वारा मुस्लिमों को बचाने के भी आरोप लगाए जा रहे थे |परन्तु सच्चाई तो यही थी महात्मा गाँधी न हिन्दू को बचा रहे थे और न मुस्लिम को, वे पूरी मानवता को बचा रहे थे|उनके लिए व्यक्ति का मतलब हिन्दू या मुसलमान नहीं था, सिर्फ मानव था|उन्हें पता था हिन्दू हों या मुस्लिम सभी के सृष्टिकर्ता एक ही हैं, और उस सर्वोच्चसत्ता के दास का कर्तव्य है — सम्पूर्ण प्राणी की सेवा|इसीसे वे अपनी जान की बिना परवाह किये हुए पीड़ितों की सेवा में लगे हुए थे|
नोआखालीमें गाँधी ने सत्य;अहिंसा और निर्भीकता के मार्ग पर चलकर इन यंत्रों के शाश्वत,सर्वकालिक और सार्वजनिक मूल्यों को स्थापित किया |नोआखाली और बिहार में उन्होंने केवल मानवीय मूल्यों की रक्षा ही नहीं की,बल्कि बेहतर मानव को गढने का प्रयास भी किया|
आज गाँधी की इस सीख को समझने की विशेष आवश्यकता है|पूरी दुनिया ने देखा है धर्म के नाम पर फैली नफरत में हमारा देश बंटा और पाकिस्तान का जन्म हुआ| परन्तु जिस धर्म के नाम पर पाकिस्तान बना वह भाषा के नाम पर एक बार फिर बंट गयाऔर पता नहीं इस नफरत के कितने टुकड़े होंगे |दरअसल नफरत की यही प्रकृति है यदि इसे फूलने या फलने का मौका मिलता है तो वह सिर्फ एक ही वर्ग या एक ही क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता,असीमित क्षेत्रों में फैलकर विनाशकारी प्रलय का दृश्य उपस्थित कर देता है |