डॉ.रीता दास राम मूलतः महाराष्ट्र के नागपुर की रहने वाली है। हिन्दी साहित्य से इन्होंने पीएच-डी. की शिक्षा प्राप्त की है। हिन्दी साहित्य की अध्येता होने के नाते इनका साहित्य से भी गहरा जुड़ाव है। लमही , गंभीर समाचार, मनस्वी , आजकल, व्यंजना, जीवन प्रभात, वागर्थ, सृजनलोक, दुनियां इन दिनों, शब्द प्रवाह सहित कई पत्र -पत्रिकाओं एवं वेबसाईट में कहानी और कविता का प्रकाशन हो चुका है। कवियों द्वारा संकलित गौरेया, शब्द प्रवाह, समकालीन हिन्दी कविता भाग-1, साहित्यायन, मुंबई की कवित्रियां आदि विषेशांको में भी इनकी रचनाओं ने स्थान पाया है। तृष्णा और गीली मिट्टी के रूपाकार नामक कविता संकलन का भी प्रकाशन हो चुका है। इसके अलावे इन्हें कई सम्मानों से भी नवाजा गया है। देश की दुर्व्यवस्था पर आकुल रीता दास राम की पांच कविताएँ  पढ़े  डॉ मधुलिका बेन पटेल की विशेष समीक्षात्मक टिप्पणी के साथ। मधुलिका बेन पटेल फणीश्वरनाथ रेणु डॉट कॉम के संपादकीय कार्यकारिणी टीम से जुड़ी हैं। … संपादक 

    वर्तमान समय के अंतर्विरोधों को व्यक्त करती कविताएँ 

रीता दास राम देश की दुर्व्यवस्था पर आकुल हैं. उनकी कविताएँ इन्हीं व्याकुल क्षणों की उपज है. ‘हादसों के बीच  चुप्पी’ कविता में बची हुई संवेदनाओं के खिलाफ होती साजिश को सामने रखा गया है. आज सदाचार का अर्थ बदल सा गया है. तथाकथित धर्म में चूर लोग राजनीति के खतरनाक षणयंत्र को नहीं समझ पा रहे. सत्ता पर आसीन होने के लिए हर ओर देश बंटवारे का भ्रम परोसा जा रहा है. यह वह समय है जिसमें मानवता के खिलाफ होती हिंसा देख कर भी हम चुप हैं. दूसरी कविता ‘प्रेम’ में रचनाकार ने प्रेम के अहसास को सामने रखा है. प्रेम एक ऐसी भावना है जिसे शरीर से ऊपर उठ कर ही समझा जा सकता है. इसे किसी काल परिवेश में नहीं बंधा जा सकता. उलझे हुए समय में भी रचनाकार इसके कोमल स्वरूप को बचाने की कोशिश करती हैं. तीसरी कविता ‘चुनाव का उत्सव’ में वे चुनावी मुद्दों की घटाटोप में सत्तासीन नेताओं के स्वार्थ को उजागर करती हैं. चुनावी राजनीति में सत्य और समझदारी समेत सब कुछ जैसे भस्म हुआ जा रहा है. कविता ‘विचार और समय’ में विचारों की हत्या को सामने रखा गया है. हर ओर मानवता की धज्जियाँ उड़ाई जा रही हैं. देश के नाम पर लोगों में जंग मची हुई है. राजनीति का स्वरूप बेहद बदरंग हो गया है. सारी अच्छाई जैसे समाप्त सी हो रही है. ‘उद्देश्य की जीवटता’ शीर्षक कविता में वर्तमान समय के अंतर्विरोधों को सामने रखा गया है. एक ओर बेशर्म हौंसले हैं, दूसरी ओर शालीनता के हाथ बांध दिए गये हैं. रचनाकार ऐसे में प्रश्न करती हैं कि यह इस सदी का कौन सा अध्याय है जिसमें महज चुनावी मुद्दों को जगह दी गयी है. इस समय का कड़वा सत्य यह है कि हर ओर कट्टरता और संकीर्णता फैली है. रीता दास राम की कविताओं में वर्तमान समय की चिंता है. भाषा के स्तर पर कविताएँ सुगठित और पठनीय हैं- डॉमधुलिका बेन पटेल, सहायक प्राध्यापक , हिन्दी विभाग तमिलनाडु केन्द्रीय विश्वविद्यालयतिरुवारूर 

1.हादसों के बीच चुप्पी
हादसे
दहशत परोसने की कोशिश हैं
बौखलाया हुआ
परिदृश्य
नासमझ हो रहा है
बची संवेदनाएँ
बोध रच रही हैं
अंकुर की कोमलता को
फ्रेम किया जा रहा है
कोपलों को
सुनने से ज्यादा
समझना जरूरी है
नवीनता के बदले
हरियाली को
खत्म करने वाली
साजिश के खिलाफ
मानवता
बची है शायद
जिसे तोड़ा जाना
आसान समझा जा रहा है
ये मासूम समय
धधकती आग
के मतलब से परे हो रहा है
भड़कती तस्वीर
मानवता को खारिज कर रही है
सदाचार का मतलब
मिटाने की कोशिश है
धर्मांधता की सड़ाँध में
बागी बन रही फिज़ाएँ
सत्ता की राजनीति
धर्म के पाटे पर
समय नाप रही है
अंध समझ के पन्ने
खुल चुके हैं
जिस पर पानी डालना
मुश्किल हो रहा है
देश बटवारे का भ्रम
परोसा जा रहा है
हमने समाज का
गलत प्रतिरूप गढ़ लिया है
हम अघाए हुकूमत के खिलाफ चुप हैं
हुकूमत ही है आदर्श
अस्थिरता व घनघोर चुप्पी है
हम जिसके बाशिंदे है
उस समाजमें अत्याचार होते देख रहे हैं।

2. प्रेम
नमी है
संवेदना से प्रज्वलित
शिकायतों की रोशनी
पर सुकून का
अहसास है प्रेम
कोमलता है
अच्छाइयों के बेल-बूटे
बुराई को निर्जीव बनाते
विश्वास की धार है प्रेम
सघन संतोष की उपज
अतीत की बालियाँ
भविष्य का अंकुर है प्रेम
प्यार प्यार होता है
कम ही लोग जानते हैं
शारीरिकता, क्षणिक आवेग
निर्मम व्याख्याएँ हैं इसकी
ये हमेशा भ्रमित करती रहेंगी इसे
आधुनिकता और पुरातनता की
छाया से अलहदा
नई घोषणाओं और
आकर्षणों का यह गुलदस्ता
सामाजिक चक्रव्यूह में
जड़ हो जाता है
अबोध हूँ
पत्थर होने से पहले
इसे बचाना चाहती हूँ।

3. चुनाव का उत्सव
चुनाव
भावनाओं और
संभावनाओं का उत्सव
अभिलाषाओं का उत्सव
उत्सव में होती
गतिविधियों का उत्सव
बहुत बहुत सारा शोर
शोर से व्याकुल सभी
सबसे अधिक
भटकती
कच्ची मिट्टी सी
समझदारी
उलझन ही उलझन
हर चीजों के अर्थ अलग
स्वार्थ का खेल ही रणनीति
मतलब की हाँडी में
भविष्य के पकते सपने
जहाँ मृगतृष्णा का प्रकोप
जलते सपने
जलती हकीकत
हकीकत नहीं है चुनावी मुद्दा
चुनावी मुद्दे में
समझ
सच
और बाकी सब
है भस्म
और भस्म का मतलब
… राख़ होता है।

4. विचार और समय
विचारों को
गोली मारा जा रहा
हर ओर
नौटंकी है
साजिश के तहत
सोचा समझा परिदृश्य
रचा गया है
विचारों को खत्म करना
आसान नहीं
यह इसका प्रमाण है
सदियों से विचार
घुमड़ रहे है
बौखलाया रोष
नई अहिल्या बन गया है
जिसे राम के दर्शन की नहीं
मानवता की धज्जियां
उड़ाने की जल्दी है
बदलती सदी के विचारों को
आत्मसात करना
मुश्किल हो रहा है
जबकि समय
उसे पीछे छोड़ आया है
लोग हैं कि लकीर पीट रहे हैं
देश के वर्तमान पर
जंग मची है
राजनीति बेहद बदरंग है
कहने के लिए बस शिकायत बची है
क्यों समय का पहिया उल्टा नहीं घूमता है

5. उद्देश्य की जीवटता
देश नहीं
पार्टी का उद्देश्य
मानवता से कट जाना
सामाजिक समुदाय के खिलाफ
खतरनाक षडयंत्र है
आक्रामकता
अपने समय में
नग्न रूप में
बेशर्म हौसलों की
वकालत करती सत्तासीन है
जबकि
शालीनता और तमीज़
बंधे हाथ पैरों से
एपिसोड के इंतजार में है
ये सदी का कौन
सा अध्याय है
जिसका पृष्ठ
सिर्फ और सिर्फ
चुनावी मुद्दा है
जिसे निहायत धार्मिक बताया जा रहा है
और संकीर्णता व कट्टरता
खतरनाक समय का कड़वा सच है
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