संस्मरण / साधना श्रीवास्तव – पैतीस साल पुरानी बात , महादेवी वर्मा से एक अविस्मरणीय मुलाकात

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वैसे तो साहित्य सृजन में इनकी अभिरुचि बालकाल से ही थी, लेकिन पुत्र खोने के बाद सारा कुछ छिन्न-भिन्न हो चुका था। पुत्र विक्षोह में टूट टूट कर बिखर रही साधना श्रीवास्तव ने बेटे की याद में ‘फूल सा रिस्ता ‘ नामक रचना लिखकर दर्द के दरिया से बाहर आई थी।  दर्द वेदना की साक्षात् अभ्व्यक्ति रूपी पाण्डुलिपि के साथ साधना श्रीवास्तव अपने शहर इलाहबाद में निवास कर रही हिन्दी की सुप्रसिद्ध लेखिका महादेवी वर्मा के समक्ष उपस्थित हुई थी। इनकी पाण्डुलिपि को पढ़कर महादेवी वर्मा ने शुभकामना के चंद शब्द अपने हाथो से लिखी थी। पैतीस साल पहले महादेवी वर्मा से हुई मुलाकात साधना के लिए बेहद खास थी।  प्रस्तुत इस खास मुलाकात पर आधारित साधना श्रीवास्तव का संस्मरण – ‘ पैतीस साल पुरानी  बात , महादेवी वर्मा से एक अविस्मरणीय मुलाकात।’

                         महादेवी वर्मा से एक अविस्मरणीय मुलाकात

साधना श्रीवास्तव

होली के आगमन पर जहाँ रंगों की बहार आ जाती है,  वहीं फाल्गुन का यह माह मेरे मन में महीयसी महादेवी वर्मा की याद को भी तरो-ताजा कर देता है ।

अगस्त 1984 की घटना है। मैं उन दिनों इलाहाबाद में रहती थी। जब इलाहाबाद विश्वविद्यालय में बी.एस.सी में अध्ययनरत मेरा बेटा सड़क दुर्घटना में दिवंगत हो गया। कुछ दिन विक्षिप्त सी रहने के बाद मैंने अपने को संभाला और विचार में आया कि अपने होनहार बेटे पर कुछ लिखूं ताकि इस  असार संसार से विदा हुआ भी अमर हो जाये ।

लेखन में रूचि मुझे बचपन से ही थी। अतः बेटे के सदमे से उबरने में कुछ हद तक मुझे कलम ने सहारा दिया। मैंने अपने पुत्र के अल्प जीवन की प्रेरक घटनाओं को संग्रहीत किया और “फूल सा रिश्ता” लघु संस्मरण पुस्तिका लिखी। महीयसी महादेवी वर्मा का निवास भी इलाहाबाद के अशोक नगर में था। श्री राम जी पाण्डेय उनके साथ रहते थे। मैंने निश्चय किया कि इस पुस्तिका पर महादेवी वर्मा के कर कमलों से कुछ लिखा कर ही प्रकाशित कराऊं। इस उद्देश्य से मैं अपने पति श्री योगेश श्रीवास्तव ए.डी.एम के साथ उनके निवास पर पहुंची।

महादेवी वर्मा मुझसे अत्यंत स्नेह और अपनत्व दर्शाती हुई मिली। मुझे बिलकुल अपनी बगल में बैठा लीं। किशोर पुत्र के बिछोह के मेरे कष्ट को सुन कर द्रवित हो बोली- “तुम्हारा कष्ट तो सचमुच बड़ा भारी है साधना”,

मेरी आँखों से अश्रु टपक पड़े l इतना अथाह स्नेह मुझे उनसे मिलेगा, इसकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी। मैं तो धरती पर पड़ी धूल सदृश थी और वह आसमान में चमकती सितारा l मेरे ह्रदय में उनकी चमक और तेज हो गई थी ।

“फूल सा रिश्ता” की पांडुलिपि पर शुभकामना के चंद शब्द अंकित कर के उन्होंने कहा कि “तुम्हारे अंदर काव्य लिखने की भी प्रतिभा प्रच्छन्न है, मैंने इस पुस्तक से जान लिया है। अगर अपने इस बच्चे के जीवन की इसमें अंकित घटनाओं को काव्य में उतार सको तो उस पर भी कुछ लिखने में मेरे मन को अच्छा लगेगा।”

  मुझे ऐसा प्रतीत हुआ जैसे कोई बहुत बड़ी आत्मा मुझमें प्रेरणा भर रही है, मैंने उनके कथन को स्वीकारा और घर वापस आ गई ।

इसके बाद मुझे अधिक समय नहीं लगा जब मैं हल्की-फुल्की श्रृद्धांजलि के रूप में काव्य-पुस्तिका “अधखिले पुष्प का सौरभ” लिख कर उनके पास लेकर गई। उन्होंने मुझे शाबासी दी और इस काव्य-कृति पर भी अपने कर-कमलो से शुभकामना के चंद शब्द अंकित किए।

यही नहीं मैं कुछ दिनों पश्चात नारी प्रधान समस्याओं पर आधारित स्व-लिखित कहानी संग्रह “उपहार” पुस्तक भी लेकर उनके पास गईं। उस पर भी उन्होंने शुभकामना की चंद अमूल्य पंक्तियाँ अंकित की जो उन्हीं की लिखावट में पुस्तक पर प्रकाशित है। यद्यपि पुस्तक “उपहार” काफी बाद में वर्ष 1997 में अंतर्राष्ट्रीय महिला वर्ष पर प्रकाशित हुई ।

मै बाद में भी जब तब उनके पास चली जाती। उन्होंने अत्यंत स्नेहपूर्ण शब्दों में मुझे सहेजा– “साधना, तुम साहित्य सेवा करती रहना। परिश्रम और लगन कभी विफल नहीं जाता। मुझे देखो, मैंने अपनी 38 वर्ष की आयु में “यामा” लिखा था, जिस पर चालीस वर्ष बाद मुझे “ज्ञान पीठ साहित्य सम्मान” से नवाजा गया। मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि चाहे कुछ विलम्ब से हो पर एक दिन ज्ञान की परख हो ही जाती है।” उनकी धैर्य और विश्वास से भरी बात मेरे मन-मस्तिष्क में अच्छी तरह से समाहित हो गयी। उनके आशीर्वचन और शुभकामना से मेरी साहित्यिक यात्रा दिन-ब- दिन सफलता की तरफ अग्रसर होती रही जिसके परिणाम स्वरूप दिल्ली से मेरी अब तक कम से कम बाईस पुस्तकें (कहानी संग्रह, काव्य संग्रह, महा पुरूषों की बायोग्राफी तथा बाल कहानियों का प्रेरक संग्रह) प्रकाशित हो चुकी है ।

अंत में अत्यंत दुखी मन से लिखना पड़ रहा है कि, जब वह गंभीर रूप से अस्वस्थ हो गईं थी,  तब भी मैं उनके निवास पर गई। श्री राम जी पाण्डेय से मिली। उन महान साहित्यकार और कवयित्री से मुलाकात नहीं हो सकी, वह उस समय कोमा में थीं। मैं  भारी मन से रजिस्टर पर हस्ताक्षर करके आ गई। इस अस्वस्थता के बाद वह नहीं रहीं। उनको श्रद्धा के साथ शतशत नमन् ।