सोमन की कविताओं में अनुभूति की सचाई और यथार्थवादी दृष्टि

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खेमकरण ‘सोमन’ के पुरखा मूलतः बिहार के मुजफरपुर जिला के थे। गरीबी बेकारी की वजह से रोजी- रोजगार की खोज में पलायन होकर इनके पूर्वज १९६४ में उत्तराखंड में जा बसे। गरीबी में पले–बढ़े खेमकरण फिलवक्त राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय चौखुटिया अल्मोड़ा उत्तराखंड में सहायक प्राध्यापक हैं। पठन-पाठन से जुड़े होने के साथ-साथ साहित्य सृजन से भी इनका गहरा जुड़ाव है। कविता, कहानी और लघुकथा लिखते है। कथादेश, कथाक्रम, लमही, बया, नया ज्ञानोदय, साहित्य अमृत, वर्तमान साहित्य, अलाव, अक्सर, पाठ, सर्वनाम, संरचना, उत्तरा महिला पत्रिका, दैनिक जागरण, कृति ओर, अविराम साहित्यिकी, आधारशिला, आजकल, अमर उजाला और प्रतिश्रुति इत्यादि पत्र-पत्रिकाओं में इनकी कविता, कहानी, लघुकथा का प्रकाशन हुआ है। कविता संग्रह लाने की तैयारी में जुटे खेमकरण ‘सोमन’ की कविताएँ पढ़े शोभा बिसेन की विशेष समीक्षात्मक टिप्पणी के साथ। – संपादक

            सोमन की कविताओं में अनुभूति की सचाई और यथार्थवादी दृष्टि               खेमकरण सोमन की कवितायेँ विविध विषयों पर आधारित हैं। कहीं वह संघर्ष भरे दौर में स्त्री के महत्व को स्थापित करते हैं तो कहीं बुर्जुआ (पूंजीवादी) व्यवस्था के हाथों उजड़ते लोगों की दारुण स्थितियों एवं देश में किसान एवं जवान की करुण व्यथा का खांका खीचते हैं। साथ ही मानवीय संबंधों में घट रहीं संवेदनाओं को अभिव्यक्त करते हैं। सोमन की कवितायेँ ‘इतना ही कि’, ‘एक और संघर्ष भरी दुनिया’ ,’इस दुनिया का वह एसा व्यक्ति है’, ‘देखा है चटनी नून बनते हुए’, ‘बाद में आना जाओ जाओ’, ‘वह और उसका दोस्त’, इन्हीं भावभूमि को आधार बनाकर लिखी गयीं हैं । सोमन की कविताओं में अनुभूति की सचाई और यथार्थवादी दृष्टी है ’जाती है चिड़िया अभी भी उस ओर’ बिहार में सूखा, बाढ़ एवं संसाधनों की कमी से उपजी गरीबी के कारण वहां के लोगों का पलायन एवं दूसरे क्षेत्रों में रहते हुए अपनी माटी के प्रति लोगों के प्रति लगाव को दर्शाती है। ‘फिर मिली एक दिन तुम’, ‘सिख गया है वह’ विविध विषम परिस्थितियों में मनुष्य की उम्मीद एवं तटस्थ भाव को दर्शाती है। मानवीय अनुभवों, उनके गहन निहितार्थों के साथ-साथ मनुष्य और प्रकृति के विभिन्न पड़ाओं के मार्मिक अनुभव प्रसंगों को उभारने वाले बिम्ब इनकी कविता में है। जीवनगत अनुभव एवं सच्चाइयों से लबरेज कविता के बिम्बों से कविता में एक लय बनती जाती है। कविता में भाषा एक पद्धति में न बंधकर, अभिव्यक्ति के लिए बोलचाल की भाषा का प्रयोग हुआ है। विविध कथ्ययुक्त कविताओं में निहित प्रश्नाकुलता, संवादधर्मिता तथा आश्चर्य विस्मय की खूबियाँ उन्हें बार-बार पढ़ने और सोचने को मजबूर करती है। – शोभा बिसेन,सहायक प्राध्यापक, गुरु घासीदास विश्वविद्यालय, बिलासपुर|
खेमकरण ‘सोमन’ की कविताएँ
1. इतना ही कि

इतना ही कि
महीनों तक होती रही बारिश
मची हुई थी त्राही-त्राही
घर मकान खेत खलिहान इूबे जा रहे थे
मर रहे थे लोग
तब एक स्त्री…

इतना ही कि
भूकम्प का था अपना लेखा-जोखा
हिल रही थी धरती जैसे हिलते हैं आँधियों में पेड़-पौधे
हिल-हिलकर मकान टूट/गिर रहे थे
पंछी भी बेघर फिर रहे थे
फटी गई थी धरती और लोग समा रहे थे
तब एक स्त्री…

इतना ही कि
भूख/भूखमरी उफान पर थी जैसे नदी
अन्न अनाज/दाने नहीं मिल रहे थे कहीं
पानी लेने जाना पड़ता था कोसों दूर
शोक में डूबे हुए थे सारे राज्य/सारे पुर
तब एक स्त्री…

इतना ही कि
महामारी मार रही थी सबको
मरने वाले याद कर रहे थे रब को
सुरक्षित रहने का नहीं दिख रहा था रास्ता
जिन्दगी कोस रही थी जिन्दगी को/तोड़ दे वास्ता
तब एक स्त्री…

इतना ही कि
तब एक स्त्री के गर्भ में सुरक्षित थे तुम!

2. देखा है चटनी नून बनते हुए

देखा है पत्तियों से रोटी/दाल भात बनते हुए
चोखा बनते हुए
पसीना खून बनते हुए
चटनी-नून बनते हुए

देखा है गन्ने की इन पत्तियों को देखा है
दिन-रात देखा है

हाँ/देखा है पत्तियों से बनी झोपड़ियों में आग लगते हुए
उन्हें जिन्दा जलते हुए
देखा है जवान उमंगों को मचलते हुए/सपनों को ढलते हुए

हाँ/देखा है फिर यह भी कि
झोपड़ी वाली जमीनों को लाला/बनियों
बाबू जी लोगों द्वारा हथियाते हुए
गोलियाँ चलाते हुए

देखा है
हाँ/बहुत करीब से देखा है
बेघर परिंदों को एक जगह से दूसरी जगह जाते हुए।

3. जाती है चिड़िया अभी भी उस ओर

न आते तो न बचते
खत्म हो जाते भूख की मार से/गरीबी की भयानक दहाड़ से
बाढ़ से/कभी सूखे से
तो अपनी माटी को छोड़कर आ गए पूर्वज
मुजफ्फरपुर बिहार से

ओह!
रोते तो आँखों से खून निकलता/लेकिन पेट में भी थी जन्मों से अशांत भूख!
और साँसे भी बेतरतीब हों गड़बड़ा गई थीं
तो इनको संभाले/परिवारों को थामे वे आ गए यहाँ
फिर यहाँ बसे तो यहीं के हो गए
तराई उत्तराखण्ड की माटी भी तरती गई इन सभी को

खबर मिली है/उधर माटी बहुत चिन्तित रही/इन सात-आठ दशकों से
कि कहाँ है
कि किधर है

मैं जानता हूँ-
जाती है चिड़िया अभी भी उस ओर
जाती हैं हवाएँ अभी भी उस ओर
जाती हैं तितलियाँ अभी भी उस ओर
जाती है नदियाँ भी
दिखता है चाँद भी वहाँ/जैसे यहाँ

माटी!
भेज रहा हूँ इन्हीं उपरोक्त संदेश वाहकों द्वारा अपना प्रणाम
प्रणाम स्वीकार करना
मैं तराई की इस माटी को जरूर अपनी ओर से और
तुम्हारी ओर से भी धन्यवाद कहता हूँ
कि दिया सब कुछ माँ की तरह!
जैसे देती रही तुम सैकड़ों वर्षों से

पर माटी!
कहना यही चाहता हूँ कि
अब पूर्वज नहीं रहे/नहीं रहे दादा-दादी/नाना-नानी/माता-पिता और अन्य

देखा है तुम्हारी याद में उन्हें रोते हुए मैंने
उनकी यह अंतिम इच्छा भी उन्हीं के साथ चली गई
कि अच्छा होता यदि मर पाते अपनी माटी की गोद में

तो भेज रहा हूँ मैं नई पीढ़ी अपनी ओर से और
अपने पूर्वजों की ओर से प्रणाम!

स्वीकार करना
ओ मिथिलांचल की माटी।

4. फिर मिली एक दिन तुम

कभी बनना पड़ा ठोस
कभी बनना पड़ा द्रव
कभी भाप बनकर उड़ता ही चला गया वहाँ/पता नहीं कहाँ
फिर मिली एक दिन तुम!

कभी बनना पड़ा पतझड़ का पेड़
कभी उदास सुबह/और कभी शाम
कभी अन्धेरी रात/कभी उदास बात
कभी बनना पड़ा पंखा और घूमता ही रहा दिन-रात
फिर मिली एक दिन तुम!

कभी बनना पड़ा इधर-उधर ठोकर खाता जमीन पर गिरा पत्थर
कभी सूखी नदी
कभी बिना लय ताल सुर का का गीत
कभी हारा हुआ/कभी खुद को मारा हुआ
फिर मिली एक दिन तुम!

कभी कहीं बैठकर रोने लगा
कभी कहीं खोने लगा/कहीं सोने लगा
कभी कोसने लगा समाज की दशा और/खुद को
कभी खत्म करने लगा धीरे-धीरे अपने वजूद को
फिर मिली एक दिन तुम!

5. वह और उसका दोस्त

वह बोल रहा था
लेकिन उसे नहीं लगा कि उसका दोस्त
उसकी बात सुन भी रहा है जबकि-
बोलो-बोलो/कहो-कहो
कितनी बार बोल-कह चुका था उसका दोस्त उससे

सॉरी! क्या कहा तुमने
प्लीज… एक बार और कहो
उसका दोस्त फिर बोला-जरा फिर से कहो तो
मेरा ध्यान कहीं और था

यह एक पढ़ा-लिखा व्यवहार था उसकी दोस्त की ओर से
उसके लिए और
वह इस सोच में संलग्न कि-
चीजें तब तकलीफ देती हैं जब तीन लोग बैठे हों और
चाय आए मात्र दो लोगों के लिए

उसने ध्यान से देखा अपने दोस्त को
तो पाया कि उसके दोस्त का सॉफ्टवेयर हो गया है पुराना और हैंग
कुछ पूर्वाग्रह के वायरस युक्त भी

इसलिए
उसके शब्द/वाक्य/भाव और दोस्ती ये चारों घुले जा रहे थे
पानी में चीनी तरह
और पानी फेंका जा रहा था बाहर गन्दी नाली में

बाहर पानी नहीं
फेंका जा रहा था वह भी

परन्तु
स्वयं को कुछ तकलीफ में डाले बिना
वह चल पड़ा अपने गन्तव्य की ओर

यह जीत भी उसकी इस कलियुग में
कुछ कम बड़ी तो नहीं।

6. इस दुनिया का वह ऐसा व्यक्ति है

वह दुनिया देखता है
हर पल खूबसूरत यह सदी देखता है
वह पेड़-पौधे और नदी देखता है
वह खेत देखता है और रेत देखता है
फिर देखता है अपना फूला और भरा हुआ पेट देखता है

वह हर जगह मौसम-बहार देखता है
वह देखता है किसी को नहीं है अब कोई कष्ट
और हर कोई है घी में डूबा हुआ
इस दृष्टि से वह मैदान और पहाड़ देखता है

वह देखता है
अन्न का भण्डार देखता है
बच्चों को पढ़ते-लिखते हुए देखता है
खाना खाते देखता है
हँसते हुए देखता है
कुछ-कुछ/कुछ कुछ सीखते हुए देखता है

वह लम्बी और चौड़ी सड़क देखता है
पर पता नहीं/क्यों नहीं कुछ फरक देखता है
वह देखता है सबके साथ खुद को और
आगे-आगे चलते हुए देखता है
देश को तेजी से बदलते हुए देखता है

जबकि
बेरोजगार कर रहे हैं आत्महत्या
वह यह नहीं देखता है

सूख रही है नदी और नहर
वह यह नहीं देखता है
खेत हो रहे हैं दिनोंदिन गायब
वह यह नहीं देखता है

स्कूल से वंचित बच्चे या
लाखों बच्चे हैं अभी भूखे पेट
वह यह नहीं देखता है

किसान और
सीमा पर जवान मर रहे हैं
वह यह नहीं देखता है

झोपड़ी कहीं उजड़ रही है
वह यह भी नहीं देखता है

वह नहीं देखता है
सोलह वर्ष की एक लड़की के साथ हुआ है उसी के शहर में गैंगरेप
और मी टू अभियान पकड़ रहा है जोर बहुत तेजी से
वह ऐसा कुछ/कुछ भी नहीं देखता है

इस तरह
इस दुनिया में वह ऐसा व्यक्ति है
जिससे अपनी दुनिया भी ठीक से
देखा-पढ़ा नहीं गया।

7. सीख गया है वह

यदि
इस आपाहिज हो सकने वाले समय में
वह गिर-हारकर भी
सीख जाता है उठना या
खड़ा होना

तो समझिए
सीख गया है वह
पतझड़ में भी
हरा होना।

8. एक और संघर्ष भरी दुनिया

स्त्री लौट रही है काम करके
लौट रही हैं गोधूलि बेला में
तेज-तेज कदमों से

कामकाज की दुनिया में
अपनी जिन्दगी की कुछ दुनिया खत्म करने के बाद
इस स्त्री को शुरू करनी हैं अभी
एक और संघर्ष-भरी दुनिया

इसलिए
यह स्त्री अच्छी तरह यह जानती हैं कि
बच्चे भूखे-प्यासे
राह ताक रहे होंगे और
पति दूर कहीं/शराब पी रहा होगा सुख-चैन से

इसी सोच में कैद
एक स्त्री लौट रही है काम करके
लौट रही हैं गोधूलि बेला में
तेज-तेज कदमों से
अपने घर।

9. बाद में आना जाओ-जाओ

मालिक जी हैं
मालिक जी नहा रहे हैं
बाद में आना/जाओ-जाओ

मालिक जी हैं
मालिक जी खाना खा रहे हैं
बाद में आना/जाओ-जाओ

मालिक जी हैं
मालिक जी सो रहे हैं
बाद में आना/जाओ-जाओ

मालिक जी हैं
मालिक जी को कहीं जाना हैं
बाद में आना/जाओ-जाओ

मालिक जी हैं
मालिक जी अभी बाहर से आए हैं
बाद में आना/जाओ-जाओ

मालिक जी हैं
मालिक जी का आज मुण्ड खराब है
बाद में आना/जाओ-जाओ

और एक दिन-
अरे वो है!
जी… जी… झोंपड़ी में/खाना खा रहे हैं

उसे तुरन्त कहो/बाहर आए
मालिक जी आए हैं।