by © Sandeep Kumar
कविता लेखन के क्षेत्र में खुद को स्थापित करने में जुटी कवयित्री रानी सुमिता अखबारों के लिए स्तंभ लेखन भी करती रहीं हैं। स्तंभ लेखक के रूप में इनकी पहचान भी है। वैसे तो इन्होंने साहित्य की कोई शास्त्रीय शिक्षा नहीं ली है। फिर भी इनका गहरा जुड़ाव साहित्य से रहा है। दरअसल इनके पिता प्रियव्रत नारायण सिन्हा (जिला एवं सत्र न्यायधीश)साहित्य के अनुरागी व्यक्ति थे। स्वयं साहित्य पढ़ते थे और अपने सभी बच्चों को साहित्य पढ़ने के लिए प्रेरित भी करते थे। महादेवी वर्मा, दिनकर, रेणु, बच्चन, प्रेमचंद की रचनाओं का पाठ बच्चों को सुनाते थे और पाठ करने के लिए प्रेरित भी करते थे। इस तरह बालकाल में ही इनका साहित्य से परिचय हुआ था। विज्ञान विषय की छात्रा होने के बावजूद साहित्य से इनका संबंध बना रहा। काॅलेज में पढ़ाई के दरम्यान ही इन्होंने अखबारों के लिए लेखन भी शुरू किया था। लेखन के शौक से ही इन्हें कविता, कहानी लिखने की भी प्रेरणा मिली। हिन्दुस्तान, प्रभात खबर, सुरभी, दैनिक जागरण, पुनर्नवा, प्रियवंदा, राजभाषा प्रकाश , नई धारा जैसी पत्र-पत्रिकाओं में इनकी कविताएं एवं कहानियां प्रकाशित हुई है। ‘सीधी वाली पगडंडी’ नामक कविता संग्रह और ‘इनकी कहानी इनकी जुबानी’ नामक साझा कथा संग्रह का प्रकाशन हो चुका है। इसके अलावे सृजन सम्मान से सम्मानित भी किया गया है। यहाँ  प्रस्तुत रानी सुमिता  की पाँच कविताएँ डॉ. मधुलिका बेन पटेल की विशेष समीक्षात्मक टिप्प्णी के साथ   . . . संपादक                 
                           मर्म को छूने वाली कविताएँ 
रानी सुमिता की कविताएँ मर्म को छूने वाली कविताएँ हैं। पहली कविता ‘रिक्शावाला’ में रिक्शेवाले की अनकही वेदना फूट पड़ी है। रिक्शे पर बैठने वाले लोग उससे एक-एक रूपये कम करने की चिल्लपों मचाते हैं, फिर वे चाहे किसी वर्ग से हों और रिक्शे वाला धूप, वर्षा, पथरीले, उबड़-खाबड़ रास्ते पर चलता है। पसीने से गमछे को तर करता, हाँफता हुआ सबको उनके गंतव्य तक पहुंचाता है। सवारियों द्वारा दिन भर एक-एक रूपये कम कर के दिए जाने पर वह अपने घाटे का हिसाब लगाता है। हम जहाँ गरीबों से एक रूपये कम में मोल-भाव करते हैं, उस समय हमें यह ध्यान नहीं रहता कि इस हिसाब से उस गरीब का कितना घाटा होगा। उस घाटे के कारण आज एक रोटी कम खरीदी जाएगी। पेट का एक हिस्सा खाली रह जायेगा। उनकी दूसरी कविता ‘समुद्र मंथन’ कूड़ा बीनने वाले बच्चों की दयनीय स्थिति को सामने लाती है। कथाओं के समुद्र मंथन से रत्न, कल्प वृक्ष, लक्ष्मी, अमृत आदि निकलते हैं, जिन्हें देवता आपस में बाँट लेते हैं। यह समुद्र मंथन हकीकत का है। आधुनिक युग में कचरे के ढेर से भारत का भविष्य अपने लिए कुछ कम टूटे-फूटे, फेंके हुए सामान तलाशता है। वे बच्चे अपनी दो जून की रोटी के लिए दिन भर सड़े-गले, टूटे-फूटे सामान की खाक छानते हैं। यह दृश्य तो पत्थरों को भी पिघला सकता है लेकिन हम मानवों को नहीं। ‘बरसो मेघ’ कविता मेघ से बारिश की आरजू करती है। बारिश धरती की साथी है। धरती की गोद में पलने वाले जीवों का प्राण है। किसानों के सूखे चेहरे की मुस्कान है। ‘सियासत’ कविता कटु यथार्थ का अंकन करती है। आज हर रिश्ते में सियासत है।  ईर्ष्या, लोभ, कुण्ठा के अंध में सहज, निश्छल रिश्ते-नाते खो से गये हैं। आखिरी कविता ‘जीवन-दर्शन’ एक सत्ता(स्त्री) से दूसरी सत्ता(पुरुष) का आमना-सामना कराती है। कुल मिला कर यह कहा जा सकता है कि गहरा यथार्थ इन कविताओं में ढल कर आता है। कविता की भाषा सुगठित और भावों को अभिव्यक्त करने वाली है – डॉ. मधुलिका बेन पटेल, सहायक प्राध्यापक, हिन्दी विभाग, तमिलनाडु केन्द्रीय विश्वविद्यालय, तिरुवारूर

1. रिक्शावाला

रिक्शावाला खीच रहा है
दम लगा कर
चमकती धूप मे
गरम हवाओ से
लड़ता भिड़ता
पथरीले रस्ते पर
ठोकरों की सौगात पर
गिरता संभलता
कीचड़ गलियों से
सनता निकलता
चौराहे की भीड़ से
बचता पिसता
गंतव्य पहुँचाता
पसीने से गमछे नहलाता
किशोर वृद्ध जवान है
रिक्शेवाला !
बैठते हैं सभी
बालक बूढ़े तगड़े
स्त्री पुरूष
गृहणी विद्यार्थी अफसर
बीस मे एक की जीत पर बलिहारी जाते
सवारी की धौस दिखते
“मजदूर आदमी हूँ हुजूर
पेट पालना है परिवार का
दूर बहुत पहुँचता हूँ”
एक रौ बोलता जाता है रिक्शावाला……
एक रूपये कम की ताव पर मुस्काते
बातचीत की तार जुटाते….
लानत जाती है सरकार पर
पेट्रोल के रूपये भर की उछाल पर
टॉपिक बदल जाते है
ये गाड़ियों की चिलपों !
ये वायुप्रदूषण !
गहन जरूरत प्रदूषनरहित कार की
अजी असंभव है जनाब !
हिसाब बिठाता है रिक्शावाला
दस लोगो ने आज थमाये
एक रूपये कम…….
ध्रूम छल्लों दरमियाँ खाँसता हाँफता
बिन धुये बिन जबान की
अपनी हाथगाड़ी टुनटुनाता
नये मोलभाव को
गले तर करता
आगे बढ़ता है
रिक्शावाला

2. समुन्द्र मंथन
भावों से भरी पर सूखी आँखों में
कुछ रहस्य था
सबसे छुपछुपा कर तलाश थी
यक्षराज के श्री घट की
लंबे पीले मटियाते फ्रॉक
कंधे से सरकते चढ़ते
दुबले नाजुक शरीर को
ढकते तोपते
भूरी सुनहरी बालो की
पतली अड़ी अड़ी चोटियाँ
एक बाँह में लाल
दूसरे में हरी चूड़ियाँ
बेपरवाह रूखे गालों के मध्य
कहीं झाँकता एक नन्हा सा तिल
दृढ़ता से बंद होंठो पर
एक अजब सा रहस्य था
कंधे ने थाम रखा था
बड़ा सा पैबंददार झोला
बांहे जल्दी में थी
कर रही थी
समुद्र मंथन
आखिर हाथ आ ही लगा
वह कुबेर धन
टिफिन का एक कम टूटा डब्बा
पानी का एक कम मुड़ा बोतल
भावपूर्ण पर सूखी आँखों ने
चालाकी से काम लिया
छोटे के लिये छुपा गई
वह बेशकीमती धन
क्योंकि
कूड़े के उस गंदे मलबे से
चुनने बिछने वाले वैसे ही
अनेक बच्चे
अलग कर रहे थे
दो जून रोटी के लिये
टूटे फूटे सड़े समान
पर उनका बचपन ढूंढ रहा था
कुछ कम टूटे
अपने हिस्से का
ईनाम
3 . बरसो मेघ

भरे भरे से हो
मेघ
सिमटाये हो जैसे
भीतर ही भीतर
कोई आवेग..
क्या छुपा रहे
कोई दुख कोई विराग!
अश्रु रोकता कोई मन
भींच लेता जैसे
भीतर सब घुटन!
बहने दो नीर
बरसो झमझम
बोझिल मन
साझा करो
सूखी हुई है धरा
ह्रदय तिक्त
दरारें गहरी
पनघट सूने
दहलीज कोरी
पीड़ा सघनतम
बढ़़ो,करो आलिंगन
तुम्हारे नीर से आकंठ
तर जायेगी धरा
दुख से दुखका ..
हो क्षरण !!

4. सियासत
ये रिश्तों की सियासत है
जिधर देखिये वहीँ बगावत है
गर शौक तुम्हें या जिद तुम्हारी
रिश्ते संभालने की
फिर तुम्हारे हिस्से
शिव का फक्कड़पन
कर्ण की दानशीलता
प्रभु ईशु की सूली
या बुद्ध का दर्शन
संभल सकते हैं रिश्ते
गर धारण कर सको तुम
अमृत और विष का
समन्वयन

5. जीवन दर्शन

वो मौन
जो पसरा रहता है
हो मुखर
तुम्हारे इर्द गिर्द
देखना तुम
भेद देगी उसे
एक दिन
मेरे जीवन की धुन
वो गांभीर्य की चद्दर
जो लिपटी रहती है
हो प्रबल
तुम्हारे चारों ओर
देखना तुम
चपेत देगी उसे
एक दिन
मेरी उमंग का एक सुर
वो अबोलापन
जो बोलता रहता है
अनवरत
तुम्हारी नजरों से
देखना तुम
चुप हो जायेगा
एक दिन
देखकर मेरी
सरलता की गुन गुन
ये तुम्हारा मौन
वोमेरी मुखरता
तुम्हारा गांभीर्य
और मेरी चपलता
तुम्हारा अमोघ अहं
मेरी निश्छल सरलता
तुम्हारा पुरुषार्थी गर्व
मेरा स्त्रियोचित हठ
शास्त्रार्थ करेंगे एक दिन
सचमुच क्या है
जीवन दर्शन
तुम्हारी ओढ़ी
बौद्धिकताया
मेरी बहती सहजता

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